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जाने ओर समझें होलाष्टक में क्या करें, क्या ना करें

इस वर्ष 2 मार्च, 2020 से आरम्भ हुआ होलाष्टक 9 मार्च 2020 को समाप्त होगा। 8 दिनों तक चलने वाले होलाष्टक को अशुभ माना गया है। होली से पहले आठ दिनों तक चलने वाला होलाष्टक इस वर्ष 2 मार्च 2020 से शुरू हो चुका है। हिंदू धर्म में होलाष्टक के दिनों को अशुभ माना गया है। होलाष्टक की शुरुआत फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि से होती है।होलाष्टक में दो शब्दों का योग है। होली और अष्टक यहां पर होलाष्टक का अर्थ है होली से पहले के आठ दिन। फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से लेकर फाल्गुन पूर्णिमा तक होलाष्टक रहते हैं। हिन्दू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि को होलिका दहन किया जाता है और अगले दिन चैत्रकृष्ण प्रतिपदा में रंग खेला जाता है। होलाष्टक के दिन से ही होलिका दहन के लिए लकड़ियां रखी जाती है। जिस जगह होलिका दहन होगा उस जगह होली की लकड़ियां रखना शुरू होता है। भारत में कई जगह रंग को धुल्हैंडी भी कहा जाता है। इसका समापन फाल्गुन की पूर्णिमा को होता है और इसी दिन होलिका दहन की परंपरा है। इस साल 2 मार्च, 2020 से लगने वाला होलाष्टक 9 मार्च को खत्म होगा। होली भारत का अत्यंत प्राचीन पर्व है जो होली, होलिका या फाल्गुनी नाम से मनाया जाता है । इसे वसंतोत्सव और काम-महोत्सव भी कहा जाता  है।  
    फाल्गुन पूर्णिमा के दिन सायंकाल शुभ मुहूर्त में अग्निदेव की शीतलता एवं स्वयं की रक्षा के लिए उनकी पूजा करके होलिका दहन किया जाता है।  देश के कई हिस्सों में होलाष्टक शुरू होने पर एक पेड़ की शाखा काटकर उसमें रंग-बिरंगे कपड़ों के टुकड़े काटकर बांध देते हैं और उसे जमीन में गाड़ते हैं। इसे भक्त प्रह्लाद का प्रतीक माना जाता है। इसी के नीचे होलिकोत्सव मनाया जाता है।  सत्ययुग में हिरण्यकशिपु, जो पहले विष्णु जी का जय नाम का पार्षद था और शाप के कारण दैत्य के रूप में जन्म लिया था, ने घोर तपस्या करके ब्रह्मा जी से वरदान पा लिया। वरदान के अहंकार में उसने देवताओं सहित सबको हरा दिया। उधर विष्णु जी ने अपने भक्त के उद्धार के लिए अपना अंश उसकी पत्नी कयाधू के गर्भ में पहले ही स्थापित कर दिया। प्रह्लाद जन्म से ही नारद जी की कृपा से ब्रह्मज्ञानी हो गए थे।एक पौराणिक कथा के अनुसार प्रह्लाद की भक्ति से नाराज होकर हिरण्यकश्यप ने होली से पहले के आठ दिनों में उन्हें अनेक प्रकार के कष्ट और यातनाएं दीं। इसलिए इसे अशुभ माना गया है।
Know-and-understand-what-to-do-in-Holashtak-Holi-2020- जाने ओर समझें होलाष्टक में क्या करें, क्या ना करें , होली- 2020     प्रह्लाद का विष्णु भक्त होना उनके पिता हिरण्यकशिपु को अच्छा नहीं लगता था। अन्य बच्चों पर विष्णु भक्ति का प्रभाव पड़ता देख, प्रह्लाद को भक्ति से रोकने के लिए हिरण्यकशिपु ने फाल्गुन शुक्ल पक्ष अष्टमी को उन्हें बंदी बना लिया। जान से मारने के लिए तरह-तरह की यातनाएं दीं, लेकिन प्रह्लाद भयभीत नहीं हुए। विष्णु कृपा से हर बार बच गए। इसी प्रकार सात दिन बीत गए। अपने भाई हिरण्यकशिपु की परेशानी देख आठवें दिन उसकी बहन होलिका, जिसे ब्रह्मा जी ने अग्नि से न जलने का वरदान दिया था, अपने भतीजे प्रह्लाद को अपनी गोद में बिठाकर अग्नि में प्रवेश कर गई। देवकृपा से वह स्वयं ही जल मरी, प्रह्लाद को कुछ नहीं हुआ। नृसिंह भगवान ने हिरण्यकशिपु का वध किया। तभी से भक्ति पर आए इस संकट के कारण, इन आठ दिनों को होलाष्टक के रूप में मनाया जाता है। एक अन्य कथा अनुसार, इन्हीं होलाष्टक के दिनों में भगवान शिव ने कामदेव को भी भस्म किया था।
होली की परंपराएँ---
होली की परंपराएँ बहुत ही प्राचीन हैं परन्तु समय के अनुसार होली खेलने के तरीका में भी परिवर्तन हुआ है। प्राचीन काल में महिलाये इस दिन पूर्ण चंद्र की पूजा करके अपने परिवार की सुख समृद्धि की कामना करती थी। इस दिन अधपके फसल को तोड़कर होलिका दहन के दिन होलिका में प्रसाद रूप में चढाकर पुनः प्रसाद खाने का का भी विधान है। भारतीय ज्योतिष के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन से नववर्ष  का  भी आरंभ माना जाता है। इस उत्सव के बाद ही चैत्र महीने का आरंभ होता है। ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी बताते हरण की यह पर्व अधिकांशतः यह पूर्वी भारत में ही मनाया जाता था। इस पर्व का वर्णन अनेक पुरातन धार्मिक पुस्तकों में मिलता है। इनमें प्रमुख हैं, नारद पुराण, भविष्य पुराण, पूर्व मीमांसा-सूत्र, कथा गार्ह्य-सूत्र आदि  ग्रंथों में भी इस पर्व का उल्लेख मिलता है। विंध्य क्षेत्र के रामगढ़ के एक अभिलेख में भी इसका उल्लेख मिला है।
    मुस्लिम पर्यटक अलबरूनी ने भी अपने ऐतिहासिक यात्रा संस्मरण में होलिकोत्सव का वर्णन किया है। भारत के अनेक मुस्लिम कवियों ने अपनी रचनाओं में इस बात का उल्लेख किया है कि होलिकोत्सव केवल हिंदू ही नहीं मुसलमान भी मनाते हैं। अकबर का जोधाबाई के साथ तथा जहाँगीर का नूरजहाँ के साथ होली खेलने का वर्णन मिलता है। शाहजहाँ के ज़माने में होली को ईद-ए-गुलाबी या आब-ए-पाशी (रंगों की बौछार) कहा जाता था। मध्ययुगीन हिन्दी साहित्य में कृष्ण की लीलाओं का वर्णन जग जाहिर है। इसके आलावा प्राचीन चित्रों, भित्तिचित्रों और मंदिरों की दीवारों पर होली उत्सव के चित्र मिलते हैं। चित्र में राजकुमारों और राजकुमारियों को दासियों सहित रंग और पिचकारी के साथ होली खेलते हुए दिखाया गया है। 17वी शताब्दी की मेवाड़ की एक कलाकृति में महाराणा को अपने दरबारियों के साथ रंग खेलते हुए दिखाया गया है।
समझें क्यों नही करने चाहिए होलाष्टक में शुभ कार्य---
होलाष्टक में शुभ कार्य न करने की ज्योतिषीय वजह यह है कि इन दिनों वातावरण में नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव बहुत अधिक रहता है। होलाष्टक अष्टमी तिथि से आरंभ होता है। अष्टमी से लेकर पूर्णिमा तक अलग-अलग ग्रहों का प्रभाव बहुत अधिक रहता है। जिस कारण इन दिनों में शुभ कार्य न करने की सलाह दी जाती है। ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया की इन 8 दिनों में ग्रह अपने स्थान में बदलाव करते हैं। इसी वजह से ग्रहों के चलते इस अशुभ समय के दौरान किसी भी तरह का शुभ कार्य नहीं किया जाता है। ज्योतिष शास्त्र में कहा गया है कि होलाष्टक के दौरान शुभ कार्य करने से व्यक्ति के जीवन में कष्ट, दर्द का प्रवेश होता है। अगर इस समय में कोई विवाह कर ले तो भविष्य में कलह का शिकार या संबंधों में टूट पड़ सकती है। इनमें अष्टमी तिथि को चंद्रमा, नवमी को सूर्य, दशमी को शनि, एकादशी को शुक्र, द्वादशी को गुरु, त्रयोदशी को बुध, चुतर्दशी को मंगल तो पूर्णिमा को राहू की ऊर्जा काफी नकारात्मक रहती है।  इसी कारण यह भी कहा जाता है कि इन दिनों में जातकों के निर्णय लेने की क्षमता काफी कमजोर होती है जिससे वे कई बार गलत निर्णय भी कर लेते हैं जिससे हानि होती है।
जानिए क्या कहते हैं वेद पुराण होलाष्टक के सम्बंध में --
होलाष्टक दोष का उल्लेख ज्योतिषशास्त्र के अन्तर्गत मुहूर्त शाखा के ग्रन्थों में मिलता है। होलाष्टक दोष का विषय अति सरल व संक्षिप्त है। इस सम्बन्ध में मात्र दो ही श्लोक हैं। एक श्लोक में यह बताया गया है कि होलाष्टक दोष कब से प्रारम्भ होता है? तथा दूसरे श्लोक में यह स्पष्ट किया गया है कि यह दोष किन-किन स्थानों में लागू होता है?

इस सम्बन्ध में शास्त्र प्रमाण देखें - 
मुहूर्त चिन्तामणि पीयूषधारा संस्कृत टीका शुभाशुभप्रकरण श्लोक सं. 40 की टीका पृष्ठ 34 में लिखा है कि

‘‘शुक्लाष्टमीसमारभ्य फाल्गुनस्य दिनाष्टकम्।    
 पूर्णिमावधिकं व्याज्यं होलाष्टकमिदं शुभे।।’’  (शीघ्रबोध श्लोक सं. 137)
‘‘शुतुद्रयां च विपाशायामैरावत्यां त्रिपुष्करे।
 होलाष्टकं विवाहावौत्याज्यमन्यत्र शोभनम्’’       (शीघ्रबोध श्लोक सं. 138)

उपरोक्त प्रमाण श्लोकों की विस्तृत व्याख्या मुहूत्र्त चिन्तामणि के सुप्रसिद्ध टीकाकार श्री कपिलेश्वर झा जी ने अपनी हिन्दी टीका में इस प्रकार लिखा है। सतलज (शुतुद्री), विपाशा (व्यास), इरावती (रावी) नदियों के तटवर्ती क्षेत्र और त्रिपुष्कर (पुष्कर) क्षेत्र में फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा से आठ दिन पहले होलाष्टक के कारण विवाहादि शुभ कार्य नहीं करना चाहिए। इनसे भिन्न स्थानों में ही विवाहादि कार्य करना चाहिए। यहाँ स्पष्ट करना आवश्यक है कि व्यास, सतलज, इरावती, नदियाँ पंजाब प्रान्त में हैं। व्यास नदी के किनारे होशियारपुर, गुरूदासपुर, मण्डी, काँगड़ा, सुलतान, कपूरथला तथा इरावती (रावी) नदी के किनारे मुलतान, मांतगोमट्टी -लाहौर, अमृतसर, पठानकोट जबकि सतलज नदी के किनारे जालन्धर, लुधियाना, पटियाला, भावलपुर शहर हैं। त्रिपुष्कर क्षेत्र जिसे वर्तमान में पुष्कर कहा जाता है, वह राजस्थान के अजमेर में है। इन्हीं शहरों के समीपवर्ती भू-भाग में होलाष्टक दोष लगता है एवं विवाहादि कार्य वर्जित हैं। इनके अतिरिक्त देश के शेष भूभाग में विवाह प्रतिष्ठादि शुभ मांगलिक कार्य सम्पन्न होंगे। मुहूर्त चिन्तामणि व मुहूर्त गणपति प्रामाणिक ग्रन्थों में देशवश ही होलाष्टक दोष के त्याग करने का शास्त्रादेश है। 
प्रमाण देखिए -
‘‘विपाशैरावतीतीरे शुतुद्रयाश्च त्रिपुष्करे।
 विवाहादिशुभे नेष्टं होलिकाप्राग्दिनाष्टकम्।।’’  (मुहूत्र्तचिन्तामणि श्लोक सं. 40)
‘‘ऐरावत्यां विपाशायां शतद्रौ पुष्करत्रये।
 होलिका प्राग्दिनान्यष्टौ विवाहादौ शुभे त्यजेत्।।’’  (मुहूत्र्तगणपति श्लोक सं. 204)

विपाशा (व्यास), इरावती (रावी), शुतुद्री (सतलज) नदियों के निकटवर्ती दोनों ओर स्थित नगर, ग्राम, क्षेत्र में तथा त्रिपुष्कर (पुष्कर) क्षेत्र में होलाष्टक दोष फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा (होलिका दहन) तिथि के पहले के आठ दिन में विवाह, यज्ञोपवीत आदि शुभ कार्य वर्जित हैं। इस प्रकार लगभग सम्पूर्ण पंजाब प्रान्त में हिमांचल प्रदेश का कुछ भू-भाग तथा राजस्थान में अजमेर (पुष्कर) के समीपवर्ती आसपास के स्थानों (सम्पूर्ण राजस्थान नहीं) में ही विशेष सावधानी के लिए होलाष्टक दोष को मानना शास्त्र सम्मत है। देश के अन्य शेष भू-भागों में होलाष्टक दोष विचार का नियम लागू नहीं करना चाहिए, ऐसा शास्त्र सम्मत निर्णय है। उपरोक्त होलाष्टक दोष के सम्बन्ध में अनेक परम्परागत ज्योतिषी व कर्मकाण्डी पुरोहित जिन्हें इस विषय की सुस्पष्ट जानकारी नहीं है, वे देश के विशाल भू-भाग जिन प्रदेशों में इसका दोष लागू नहीं होता है, वहाँ पर भी होलाष्टक दोष का भय दिखाकर अबोध जनता के शुभकार्यों में अनावश्यक रूप से बाधा उत्पन्न कर देते हैं। शास्त्र वचनों के एक भाग को मानना व दूसरे भाग को न मानना विद्वान मनुष्यों का लक्षण कदापि नहीं हो सकता है। इस सम्बन्ध में काशी (वाराणसी) के समस्त पंचागकार बहुत ही स्पष्ट रूप से होलाष्टक के सम्बन्ध में उपर्युक्त प्रमाण श्लोक प्राचीन काल से लिखते चले आ रहे हैं। किन्तु इसके बावजूद कुछ पंडित लोग आज भी वर्तमान समय में होलाष्टक दोष के वास्तविक स्वरूप से अज्ञात होने के कारण स्पष्ट जानकारी के अभाव में समाज को भ्रमित करने का महाशास्त्रीय अपराध करते चले आ रहे हैं।इसी भ्रान्ति के निवारण हेतु काशी के सुप्रसिद्ध पंचांगकार श्रीगणेश आपा जी ने संवत् 2070 (सन् 2013-14) के पंचांग में एवं संवत् 2074 (सन् 2017-18) ई. के अपने पंचांग में फाल्गुन शुक्ल पक्ष में स्पष्ट निर्णय देकर भ्रान्ति निवारण हेतु जन उपयोगी अति महत्त्वपूर्ण सराहनीय कार्य किया है। 
       श्री गणेश आपा जी पंचांग में स्पष्ट निर्णय दिया गया है कि होलाष्टक दोष किन स्थानों पर होता है? पंजाब प्रान्त पुष्कर (अजमेर)  विपाशा (व्यास) इरावती (रावी) शतदु्रम (सतलज) नदियों के तट पर स्थित (धवलपुर, लुधियाना, फिरोजपुर, गुरूदासपुर, होशियारपुर, कांगड़ा, कपूरथला........) आदि में होलाष्टक दोष होता है। होलाष्टक दोष केवल विवाह के लिये है, अन्य शुभ कार्यों के लिए नहीं है। अन्य प्रान्तों में होलाष्टक का कोई दोष नहीं होता है। इन्हीं प्रमाणों के आधार पर ही काशी (वाराणसी) के सभी पंचांगों में होलाष्टक के काल समय में भी विवाह मुहूत्र्त दिये जाते हैं । होलाष्टक दोष के सम्बन्ध में एक बात और भी विशेष ध्यान देने योग्य है कि जिन स्थानों में होलाष्टक दोष लागू होता है, उन क्षेत्रों में भी विवाह संस्कार के अतिरिक्त छोटे-बडे़ सभी शुभ मांगलिक कार्य जैसे - गृहारम्भ, गृहप्रवेश, मन्दिर देव प्रतिष्ठा-स्थापना, यज्ञादि कार्य, द्विरागमन, वधु प्रवेश, व्यापार आरम्भ, क्रय-विक्रय, कथा पुराण (भागवतादिश्रवण), ग्रह शांति, मंत्र-जप-अनुष्ठान, नवीन कार्य प्रारम्भ, समस्त संस्कार (विवाह पाणिग्रहण संस्कार को छोड़कर) आदि समस्त शुभ कार्य निर्बाध रूप से सम्पन्न होंगे। देश के अन्य क्षेत्रों में जहाँ पर होलाष्टक दोष शास्त्रोक्त प्रमाण से लागू नहीं होता है, उन प्रदेशों में विवाह सम्बन्धी शुभकार्य के साथ ही समस्त शुभकार्य बिना किसी रोक-टोक के निश्चित रूप से सम्पन्न करने चाहिए।
होलाष्टक के दौरान करें ये विशेष पूजा---
  • 1. होलाष्टक के दिनों को भक्तों को लड्डू गोपाल की पूजा विधि विधान से करनी चाहिए। पूजा के दौरान गाय के शुद्ध घी और मिश्री से हवन करना चाहिए। इस विधि से संतान प्राप्ति के योग बनते हैं।
  • 2. होलाष्टक में जौ, तिल और शक्कर से हवन करने से आपको अपने करियर में तरक्की मिलेगी।
  • 3. होलाष्टक के दिनों में कनेर के फूल, गांठ वाली हल्दी, पीली सरसों और गुड़ से हवन करने से धन-संपत्ति में वृद्धि के योग बनते हैं।
  • 4. इसी के साथ ही अगर आप होलाष्टक के दिनों में भगवान शिव का महामृत्युंजय मंत्र का जाप करते हैं तो आपके स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माना जाता है। इससे शरीर के सभी रोग दूर होते हैं।

होलाष्टक में नकारात्मकता का प्रभाव---
हिंदू धर्म ग्रंथों और पौराणिक मान्यताओं के आधार पर बताया जाता है कि होलाष्टक के समय में भक्त प्रह्लाद को अनेक प्रकार की यातनाएं दी गई थीं, इसलिए इस 8 दिनों के समय को नकारात्मकता वाला माना जाता है। इसी के चलते इन दिनों में किसी तरह के मांगलिक कार्य से दूर रहा जाता है।
होलाष्टक में करें भगवान की वंदना---
होलाष्टक के आठ दिनों के बीच आपको भगवान का भजन, जप, तप आदि करना चाहिए। कहा जाता है इन दिनों में भक्त प्रह्लाद पर कष्टों की बौछार की गई। जिसके चलते उनके काफी कष्ट हुआ। वहीं इन दिनों भगवान विष्णु या फिर अपने इष्टदेव की आराधना करनी चाहिए। जिस प्रकार भगवान विष्णु ने भक्त प्रह्लाद के सभी संकटों का निवारण किया था, ठीक वैसे ही भगवान आपके कष्टों को भी दूर करेंगे।
होलाष्टक में भूलकर भी नहीं करने चाहिए ये काम ---
  1. शादी: ये किसी के भी जीवन के सबसे महत्वपूर्ण लम्हों में से एक होता है। यह वो मौका होता है जब आप किसी के साथ पूरा जीवन व्यतीत करने के वादे करते हैं। यहां से जिंदगी का एक अलग पन्ना भी शुरू होता है। इसलिए शादी को बहुत ही शुभ माना गया है। यही कारण है कि हिंदू धर्म मे होलाष्टक में विवाह की मनाही है।  अत: इन दिनों में विवाह का कार्यक्रम नहीं किया जाना चाहिए। 
  2. नामकरण संस्कार: किसी नवजात बच्चे के नामकरण संस्कार को भी होलाष्टक में नहीं किया जाना चाहिए। हमारा नाम ही पूरे जीवन के लिए हमारी पहचान बनता है। नाम का असर भी हमारे जीवन पर अत्यधिक पड़ता है। इसलिए यह बहुत जरूरी है कि इसे शुभ काल में किया जाए।
  3. विद्या आरंभ: बच्चों की शिक्षा की शुरुआत भी इस काल में नहीं की जानी चाहिए। शिक्षा किसी के भी जीवन के सबसे शुभ कार्यों में से एक है। इसलिए जरूरी है कि जब अपने बच्चे को किसी गुरु के देखरेख में दिया जाए तो वह शुभ काल हो। इससे बच्चे की शिक्षा को लेकर अच्छा असर होता है और तेजस्वी बनता है। 
  4. संपत्ति की खरीद-बिक्री: ये कार्य भी होलाष्टक काल में नहीं किया जाना चाहिए। इससे अशांति का माहौल बनता है। संभव है कि आपने जो संपत्ति खरीदी या बेची है, वह बाद में आपके लिए परेशानी का सबब बन जाए। इसलिए कुछ दिन रूककर और होलाष्टक खत्म होने के बाद ही इन कार्यों को हाथ लगाएं। 
  5. नया व्यापार और नई नौकरी: आप नया व्यापार शुरू करना चाहते हैं या फिर कोई नई नौकरी ज्वाइन करना चाहते हैं तो बेहतर है इन दिनों में इसे टाल दें। आज की दुनिया में व्यवसाय या नौकरी किसी के भी अच्छे जीवन का आधार है। इसलिए होलाष्टक के बाद इन कार्यों को करें। इससे सकारात्मक ऊर्जा आपके साथ रहेगी और आप सफलता हासिल कर सकेंगे।

महाशिवरात्रि पर बन रहे हैं तीन महासंयोग, शिव आराधना का मिलेगा विशेष लाभ

Three-Mahayoga-are-being-organized-on-Mahashivratri-on-21-February-2020- महाशिवरात्रि पर बन रहे हैं तीन महासंयोग, शिव आराधना का मिलेगा विशेष लाभशिव आराधना का मिलेगा विशेष लाभ

शिव आराधना का महाशिवरात्रि पर्व है 21 फरवरी 2020 को शश, सुस्थिर व सर्वार्थ सिद्धि जैसे शुभ योगों के बीच मनेगा। इन योगों के चलते इस दिन की शुभता में बढ़ोतरी होगी, वही श्रद्धालुओं द्वारा की गई साधना उपासना का उन्हें कई गुना पुण्य फल प्राप्त होगा। शिवालयों में इस दिन भगवान भोलेनाथ की विशेष पूजा अर्चना, जलाभिषेक व रात्रि जागरण के आयोजन होंगे। 
     महाशिवरात्रि पर इस बार 29 वर्षों बाद शश योग बन रहा हैं।  इसका कारण यह है कि शनि 29 साल बाद अपनी राशि मकर में है। इसी तरह गुरु भी अपनी राशि धनु में स्थित है। ऐसी स्थिति और चंद्र शनि के 1,4,7 या दसवें स्थान पर होने पर यह योग निर्मित होता है। इस योग में की गई पूजा जातक के लिए विशेष फलदायी होती है। इस दिन सर्वार्थसिद्धि व सुस्थिर योग भी रहेंगे। 
    पण्डित दयानन्द शास्त्री जी बताते हैं कि श्रवण नक्षत्र और चतुर्दशी के एक साथ होने पर यह योग बनते हैं। यह दोनों योग भी शुभ माने गए हैं। इस दिन की गई पूजा का विशेष फल मिलता है। ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि इस वर्ष महाशिवरात्रि पर सर्वार्थ सिद्धि योग का संयोग भी रहेगा। इस योग में भगवान शिव-पार्वती की पूजा-अर्चना को श्रेष्ठ माना गया है। महाशिवरात्रि को शिव पुराण और महामृत्युंजय मंत्र का जाप करना चाहिए। 
शिवरात्रि की शुभता में बढ़ोतरी करेगा तीन योगों का संयोग
इस महाशिवरात्रि पर चंद्र शनि की मकर में युति के साथ पंच महापुरुष योग बन रहा है, इसे शश योग भी कहते हैं। श्रवण नक्षत्र में आने वाली शिवरात्रि और मकर राशि के चंद्रमा का योग बनती है। यह संयोग शनि के मकर राशि में होने से और चंद्र का गोचर क्रम में शनि के अधिपत्य वाली मकर राशि में होने से शश योग का संयोग बन रहा है। इस दिन रात्रि के चारों प्रहर में शिव पूजा करना चाहिए।
शिवरात्रि है सिद्धि रात्रि
शश योग कई जातकों की कुंडली में भी होता है। इस योग वाले जातकों को शिवरात्रि पर शिव की विशेष उपासना का श्रेष्ठ फल प्राप्त होता है और जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती है। यह योग हंस योग, मालव्य व रूचक योग की बातें उतना ही विशेष होता है। साधना की सिद्धि के लिए दीपावली के बाद महाशिवरात्रि को सिद्धी रात्रि माना गया है।
      इस वर्ष 2020 में महाशिवरात्रि की दूसरी विशेष बात ये है कि महाशिवरात्रि के पावन दिन पर सर्वार्थ सिद्धि योग भी बन रहा है। जिसमें शुभ कार्य संपन्न करने से लाभ मिलता है। इसी के साथ 117 साल बाद शनि और शुक्र का दुर्लभ योग भी महाशिवरात्रि के दिन बन रहा है। इस शिवरात्रि शनि अपनी राशि मकर में मौजूद रहेंगे और शुक्र अपनी उच्च राशि मीन में रहेंगे। बताया जा रहा है कि ये स्थिति 1903 में बनी थी। इस योग के कारण भगवान शिव की अराधना करने से शनि, गुरु और शुक्र ग्रह मजबूत होंगे।
    ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी के अनुसार महाशिवरात्रि के दिन श्रद्धालुओं को ज्यादा से ज्यादा दान देने से पुण्य मिलता है. इसके साथ ही महाशिवरात्रि के अवसर पर साधु-संतों के साथ ब्राह्मणों और गरीबों को भोजन कराकर वस्त्र दान करना चाहिए. साथ ही गायों को हरा चारा खिलाना भी शुभ माना जाता है।  महाशिवरात्रि के अवसर पर पक्षियों को दाना डालने के साथ कुंडली लगाना भी शुभ माना जाता है ।
साथ ही इस दिन पीपल को जल चढ़ाने से भी शुभ फल की प्राप्ति होती है। इसके साथ साथ शिव पुराण और महामृत्युंजय मंत्र का जाप करना भी शुभफल दाई होता है।

जाने और समझें शुक्र एवम शुक्र के कारण होने वाले रोगों को

वैदिक ज्योतिष में शुक्र ग्रह को एक शुभ ग्रह माना गया है। इसके प्रभाव से व्यक्ति को भौतिक, शारीरिक और वैवाहिक सुखों की प्राप्ति होती है। इसलिए ज्योतिष में शुक्र ग्रह को भौतिक सुख, वैवाहिक सुख, भोग-विलास, शौहरत, कला, प्रतिभा, सौन्दर्य, रोमांस, काम-वासना और फैशन-डिजाइनिंग आदि का कारक माना जाता है। 
समझें शुक्र एवम शुक्र के प्रभाव को--
ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि शुक्र, वृषभ और तुला राशि का स्वामी होता है और मीन इसकी उच्च राशि है, जबकि कन्या इसकी नीच राशि कहलाती है। शुक्र को 27 नक्षत्रों में से भरणी, पूर्वा फाल्गुनी और पूर्वाषाढ़ा नक्षत्रों का स्वामित्व प्राप्त है। ग्रहों में बुध और शनि ग्रह शुक्र के मित्र ग्रह हैं और तथा सूर्य और चंद्रमा इसके शत्रु ग्रह माने जाते हैं। शुक्र का गोचर 23 दिन की अवधि का होता है अर्थात शुक्र एक राशि में क़रीब 23 दिन तक रहता है।
        ज्योतिष में धन और लक्ष्मी का कारक शुक्र ग्रह को माना गया है। सबसे ज्यादा धन देने में यही ग्रह समर्थ है। शुक्र ग्रह को शुक्राचार्य/दैत्याचार्य भी कहाँ जाता है। वृषभ और तुला राशि का स्वामी शुक्र ही होता है। तुला राशि शुक्र की मूल त्रिकोण अर्थात सबसे प्रिय राशि है। व्यय भाव अर्थात पत्रिका का 12वां स्थान इसकी सबसे प्रिय जगह है। 12वीं राशि मीन में यह उच्च राशि का होता है। इस ग्रह को भोग प्रिय ग्रह कहा गया है। इसलिये पत्रिका के बारहवें भाव जिसे खर्च, शय्या स्थान भी कहा जाता है, वहां यह ग्रह सबसे शानदार परिणाम देता है। यदि आपकी कुंडली में यह ग्रह अच्छी स्थिति में है तो आपको शानदार जीवन जीने को मिलेगा। शुक्र की नीच राशि कन्या होती है। जहा ये ग्रह अच्छे परिणाम नही देता।

शुक्र की शुभ स्थिति--

Know-and-understand-the-diseases-caused-by-Venus-जाने और समझें शुक्र एवम शुक्र के कारण होने वाले रोगों कोपत्रिका में वृषभ, तुला तथा मीन राशि का शुक्र हो तो जातक यदि दरिद्र परिवार में भी जन्मा हो तो अमीर बन जाता है। यदि किसी भी राशि का शुक्र बारहवें भाव में हो तो जातक को वैभवपूर्ण जीवन जीने कॊ मिल ही जाता है। यदि पत्रिका के 6ठे भाव मॆ स्थित होकर भी यह ग्रह जब 12वे स्थान कॊ देखता है तो अच्छे परिणाम देता है। पत्रिका के दूसरे तथा सातवें मॆ बैठा शुक्र शादी के बाद आर्थिक स्थिति को शानदार कर देता है।

पत्नी, प्रेमिका व सुंदर वाहन--

शुक्र ग्रह को प्रेमिका माना गया है। संसार मॆ समस्त तरह का प्रेम इसी ग्रह से देखा जाता है।राधा कृष्ण का दिव्य प्रेम शुक्र ग्रह से ही सम्भव है। संसार मॆ समस्त सुंदरता इस ग्रह से ही है।शानदार तथा महँगे वाहन, मकान इस ग्रह की कृपा से ही सम्भव है।

शनि का परम मित्र हैं शुक्र--

जीवन मॆ कड़ी मेहनत से ही लक्ष्मी प्राप्ति होती है चाहे वह कर्म कैसा भी हो। हां एक बात अवश्य है की आपके कर्मफल भोगना पड़ता है। शनि व शुक्र का विशेष प्रेम है शुक्र की राशि तुला मॆ शनि उच्च राशि का होता है। यानी आपने जी तोड़ परिश्रम किया है तो लक्ष्मी कृपा आपको अवश्य प्राप्त होगी।

स्वच्छता पसंद है शुक्र ग्रह को--

दीवाली के पहले लक्ष्मी पूजन के लिये हम सभी जगह सफाई करते है रंग रोगन भी करते है साफ वस्त्र पहनते है। इस तरह हम शुक्र ग्रह को अपने अनुकूल बनाने का प्रयास करते हैं। यदि आप स्वच्छ रहते है (निर्धन भी स्वच्छ रह सकता है) तथा कड़ी मेहनत करते है तो निश्चित रूप से आप पर लक्ष्मी मां की कृपा होगी।
भगवान विष्णु, लक्ष्मी तथा भ्रगु ऋषि में समझौता
मां लक्ष्मी हमेशा क्षीरसागर में शेषनाग में विश्राम कर रहे भगवान विष्णु की चरण सेवा करती हैं। एक बार त्रिदेव के क्रोध की परीक्षा हेतु ऋषि भ्रगु ने क्षीरसागर में शयन कर रहे भगवान विष्णु के वक्षस्थल पर प्रहार किया था। जिससे रुष्ट होकर माता लक्ष्मी ने ब्राह्मणों कों दरिद्र होने का शाप दिया। बदले में भ्रगु ने भी मां लक्ष्मी को श्राप दिया। इस झगडे को भगवान विष्णु ने सुलझाया। उन्होने कहा, जहाँ ब्राह्मण अपनी पूजापाठ व आशीर्वाद देगा वहा लक्ष्मी को आना ही पड़ेगा साथ ही जो व्यक्ति ब्राह्मणों को दान देगा उसे ही लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होगी।
     ज्योतिषीय ग्रंथों में शुक्र को भोग का कारक ग्रह माना गया है। इसका प्रभाव जातक के भोग करने पर अधिक पड़ता है। उसे जननेन्द्रिय सम्बन्धी रोगों का अधिक सामना करना पड़ता है।  जब जन्म पत्रिका में शुक्र निर्बल अथवा पीड़ित हो अथवा शुक्र के गोचर काल में जातक को गुप्त रोग, जननेन्द्रिय के पूर्ण रोग, स्त्रियों को प्रदर संतान बंध्यत्व, स्तन रोग, वक्ष ग्रन्थि, पुरुष को शीघ्रपतन, लिंग सिकुड़ना, उपदंश, मूत्र संस्थान के रोग, दवा की विपरीत प्रतिक्रिया, कैंसर, गंडमाला, अधिक सम्भोग के बाद कमजोरी अथवा चन्द्र व चतुर्थ भाव के पीड़ित होने पर हृदयाघात भी हो सकता है। 
खगोलीय दृष्टि से शुक्र ग्रह का महत्व---
खगोल विज्ञान के अनुसार, शुक्र एक चमकीला ग्रह है। अंग्रेज़ी में इसे वीनस के नाम से जाना जाता है। यह एक स्थलीय ग्रह है। शुक्र आकार तथा दूरी में पृथ्वी के निकटतम है। कई बार इसे पृथ्वी की बहन भी कहते हैं। इस ग्रह के वायु मंडल में सर्वाधिक कार्बन डाई ऑक्साइड गैस भरी हुई है। इस ग्रह से संबंधित दिलचस्प बात यह है कि शुक्र सूर्योदय से पहले और सूर्यास्त के बाद केवल थोड़ी देर के लिए सबसे तेज़ चमकता है। इसी कारण इसे भोर का तारा या सांझ का तारा कहा जाता है।
         इस प्रकार आप समझ सकते हैं कि खगोलीय और धार्मिक दृष्टि के साथ साथ ज्योतिष में शुक्र ग्रह का महत्व कितना व्यापक है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार ऐसा कहा जाता है कि किसी व्यक्ति की जन्म कुंडली में स्थित 12 भाव उसके संपूर्ण जीवन को दर्शाते हैं और जब उन पर ग्रहों का प्रभाव पड़ता है तो व्यक्ति के जीवन में उसका असर भी दिखाई देता है।
धार्मिक दृष्टि से शुक्र ग्रह का महत्व --
पौराणिक मान्यता के अनुसार, शुक्र ग्रह असुरों के गुरू हैं इसलिए इन्हें शुक्राचार्य भी कहा जाता है। भागवत पुराण में लिखा गया है कि शुक्र महर्षि भृगु ऋषि के पुत्र हैं और बचपन में इन्हें कवि या भार्गव नाम से भी जाना जाता था। पण्डित दयानन्द शास्त्री जी के अनुसार ज्योतिष शास्त्रों में शुक्र देव के रूप का वर्णन कुछ इस प्रकार किया गया है - शुक्र श्वेत वर्ण के हैं और ऊँट, घोड़े या मगरमच्छ पर सवार होते हैं। इनके हाथों में दण्ड, कमल, माला और धनुष-बाण भी है। शुक्र ग्रह का संबंध धन की देवी माँ लक्ष्मी जी से है, इसलिए हिन्दू धर्म के अनुयायी धन-वैभव और ऐश्वर्य की कामना के लिए शुक्रवार के दिन व्रत धारण करते हैं।

गुरु कृपा प्राप्त करे--

यदि आप धन लक्ष्मी प्राप्त करना चाहते है तो इसके लिये आपको कड़ी मेहनत, स्वच्छता के अलावा गुरु, ब्राह्मण कृपा व आशीर्वाद आवश्यक है। यदि ब्राह्मण और गुरु रुष्ट है तो आपकी लक्ष्मी अन्यत्र चली जायगी। ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी बताते हैं कि शुक्र के रोग भाव के स्वामी के साथ होने पर जातक को नेत्र में चिन्ह बनता है। शुक्र की महादशा तथा शुक्र की अन्तर्दशा में जातक को विभिन्न रोग हो सकते हैं। 
  • शुक्र यदि द्वितीय भाव में है तो हृदयरोग, नेत्रकष्ट, मानसिक समस्या, चोरी के कारण धन हानि, राजप्रकोप अथवा शत्रु प्रबल होते हैं।
  • शुक्र तृतीय अथवा एकादश भाव में होने पर राजा अर्थात् उच्चाधिकारी से दण्ड, अग्निकाण्ड, भाई से कष्ट तथा कई अन्य कष्ट हो सकते हैं।
  •  शुक्र त्रिकोण अर्थात् लग्न, पंचम अथवा नवम भाव में होने पर जातक अपनी बुद्धि का सही प्रयोग नहीं कर पाता है। वह सदैव शंका व संशय में रहता है शारीरिक व मानसिक कष्ट भी प्राप्त होते हैं। इस स्थिति की सम्भावना
  • शुक्र के 4-6-8 अथवा 12वें भाव में होने पर अथवा शुक्र गोचरवश इन भावों में आने पर ही अधिक होती है।

आप यह न समझें कि यदि आपकी पत्रिका में शुक्र पापी है तो आपको केवल यही रोग होंगे, रोग होने में शुक्र किस भाव में तथा किस राशि में स्थित है, इस बात का भी बहुत असर होता है। यहां पर हम पत्रिका में शुक्र किस राशि में होने पर किस रोग की सम्भावना अधिक होती है। इसकी इस लेख द्वारा जानकारी प्राप्त करेंगे।
  1. शुक्र यदि मेष राशि में हो तो जातक को शिरोरोग, शूल, नेत्र रोग तथा सिर पर चोट का भय होता है।
  2. शुक्र के वृषभ राशि में होने पर जातक को तभी रोग होते हैं, जब शुक्र अत्यधिक पीड़ित हो। इनमें आहार नली का संक्रमण, गलसुए, टान्सिल्स, मुख व जिव्हा पर छाले जैसे रोग अधिक होते हैं।
  3. शुक्र के मिथुन राशि में होने पर जातक को गुप्त रोग, चेहरे पर मुंहासे आदि होते हैं। यदि लग्नस्थ शुक्र है तो चर्मविकार के साथ रक्त विकार की भी सम्भावना होती है।
  4. शुक्र के कर्क राशि में होने पर जातक को जलोदर, वक्ष सूजन, अपच, वमन अथवा जी मिचलाने जैसे रोग होते हैं। मंगल की दृष्टि होने पर अक्सर शरीर में जल की कमी से ग्लूकोज की बोतलें चढ़ती हैं।
  5. शुक्र के सिंह राशि में होने पर जातक को हृदयविकार, रीढ़ की हड्डी की पीड़ा व रक्त धरमनियों के रोग अथवा धमनी रक्त का थक्का जमने से हृदयाघात का योग बनता है।
  6. शुक्र के कन्या राशि में होने पर जातक को खूनी अतिसार, थोड़ा भी खाते ही शौच जाना तथा भोजन का न पचना जैसे रोग उत्पन्न होते है। 
  7. शुक्र के तुला राशि में होने पर जातक को मूत्र संस्थान के रोग, शीघ्रपतन तथा गुरु के भी पीड़ित होने पर मधुमेह जैसे रोग होते हैं।
  8. शुक्र के वृश्चिक राशि में होने पर पुरुष जातक को अण्डकोष के रोग, अल्पवीर्यता, हर्निया की शल्य क्रिया, उपदंश तथा स्त्री जातक को गर्भाशय संक्रमण योनिरोग, श्वेत प्रदर व गुदाद्वार के रोग होते हैं।
  9. शुक्र के धनु राशि में होने पर जातक को गुदा रोग अथवा शल्य क्रिया, फिशर, गुप्तेन्द्रिय रोग, स्नायु रोग, कमर की पीड़ा, दुर्घटना में कमर उतरना जैसे रोग अधिक होते हैं।
  10. शुक्र के मकर राशि में होने पर जातक को घुटनों की पीड़ा व सूजन, त्वचा रोग, कमर से निचले हिस्से में पीड़ा व स्नायु विकार के रोग होते हैं।
  11. शुक्र के कुंभ राशि में होने पर जातक को रक्तवाहिका के रोग, घुटने में पीडा अथवा सूजन, रक्तविकार स्फूर्ति में कमी, काम में मन न लगना आदि रोग होते हैं।
  12. शुक्र मीन राशि में होने पर जातक को पैरों के पंजों के रोग अधिक होते हैं। तथा गुरु के भी पीड़ित होने पर मधुमेह रोग की संभावना बढ़ जाती है।
जानिए शुक्र ग्रह के मंत्र -

शुक्र का वैदिक मंत्र---
ॐ अन्नात्परिस्त्रुतो रसं ब्रह्मणा व्यपिबत् क्षत्रं पय: सोमं प्रजापति:।
ऋतेन सत्यमिन्द्रियं विपानं शुक्रमन्धस इन्द्रस्येन्द्रियमिदं पयोऽमृतं मधु।।

शुक्र का तांत्रिक मंत्र---
ॐ शुं शुक्राय नमः

शुक्र का बीज मंत्र---
ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः

क्या होगा यदि शुक्र स्थित हो रोग/ऋण/शत्रु (6ठे भाव में) तो --
शुक्र की इस भाव में स्थिति आपके कुल की श्रेष्ठता का द्योतक हो सकती है। आप सुशिक्षित और विवेकवान हो सकते हैं। लेकिन यहां स्थित शुक्र आपको डरपोक बना सकता है अथवा आपको स्त्रियों से अप्रियता भी मिल सकती है। गुरुजनों से भी आपका विरोध रह सकता है। पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि इस भाव में शुक्र के शुभ फल अधिक मिलते हैं, मतान्तर से शुक्र यहाँ निष्फल होता है लेकिन अधिक मत शुक्र के शुभ फल देने के हैं। शुक्र के निष्फल होने के मत में जातक शारीरिक रूप से सुखहीन, दुराचारी, अधिक मित्र वाला, मूत्र रोग से ग्रसित, विपरीत लिंग में प्रिय, गुप्तरोगी, समस्त प्रकार के वैभव व सुख से रहित, संकीर्ण मानसिक प्रवृत्ति का, शारीरिक रूप से भी अववस्थ व अक्षम, सदैव दुःखी रहने वाला परन्तु शत्रुनाशक तथा विवाहोपरान्त भाग्योदय अवश्य होता है। दूसरे मत में अर्थात् शुक्र के शुभ फल में जातक अत्यधिक सुख प्राप्ति, धनवान, अधिक शारीरिक सुख प्रापत करने वाला तथा समस्त प्रकार के वैभव को भोगने वाला होता है।
       ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि ऐसा जातक अपने मातृपक्ष (मामा-मौसी) के लिये अशुभ होता है। इस भाव में शुक्र यदि पृथ्वी तत्व (वृषभ, कन्या व मकर) राशि में हो तो जातक का जीवनसाथी सुन्दर तो होता है परन्तु झगड़ालू प्रवृत्ति का होता है। वह परिवार में सामंजस्य बनाकर चलता है। ऐसे लोगों को )ण से बचना चाहिये क्योंकि यदि उन्होंने एक बार )ण ले लिया तो फिर इस योग के प्रभाव से वह जीवनपर्यन्त )णग्रस्त रहेंगे। एक पुत्री को वैधव्य भोगना पड़ सकता है जिसका पूर्ण खर्चा जातक को ही उठाना पड़ता है। खाने में कोई संयम नहीं रखते हैं। गुप्त रोग के साथ मूत्र संस्थान का संक्रमण भी हो सकता है।
      आपको शत्रुओं से पीडा भी मिल सकती है। हांलाकि आप शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर पाएंगे। आपको भाई-बहनों और मामा से सुख मिलेगा। आपके मामा के कन्या संतान अधिक हो सकती हैं। आपके अच्छे मित्रों की संख्या कम होगी जबकि खराब आदतों वाले मित्र अधिक संख्या में होंगे। आपकी प्रथम संतान पुत्र के रूप में हो सकती है। आपकी संतान अच्छी होगी और आप पुत्र-पौत्रों से युक्त होंगे। किसी भी जन्म कुंडली के छठे भाव में शुक्र  जातक की कुंडली के छठे भाव में बैठा शुक्र जातक को विपरित लिंग की ओर आकर्षित करता है। 
     लग्न का छठा भाव बुध और केतू का माना गया है जो एक दूसरे के शत्रु हैं, लेकिन शुक्र दोनों का मित्र है. इस घर में शुक्र नीच होता है। लेकिन यदि जातक विपरीत लिंगी को प्रसन्न रखता है और सारे और सुविधा उपलब्ध करवाता है तो उसके धन और पैसे में बृद्धि होगी।  ऐसा जातक अपने काम को बिच में अधूरा नहीं छोड़ता है। इस भाव के शुक्र पर हुए मेरे शोध का फल कहता है कि ऐसा जातक संसार के प्रत्येक सुख का भोग करता है लेकिन इस भोग के कारण उसे गुप्त रोग भी होता (कर्क, वृश्चिक व मीन) राशि में हो तो जातक अत्यधिक यदि पुरुष राशि (मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु व कुंभ) में हो तो जीवनसाथी सुन्दर व सुशील होता है परन्तु वह कठोर भाषा का प्रयोग अधिक करता है। 
   जब स्त्री राशि (वृषभ, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर व मीन) में शुक्र होने पर जीवनसाथी बहुत ही कोमल शरीर का परन्तु स्वभाव बिलकुल विपरीत होता है। संतान कम होती है। पण्डित दयानन्द शास्त्री जी के अनुसार ऐसा जातक रुपया लगाकर व्यापार में पूर्णतः असफल होता है परन्तु बिना धन के व्यवसाय में सफल हो जाता है। उदाहरण के लिये जैसे किसी व्यवसाय में कोई ऐसा व्यक्ति धन लगाये जिसे व्यापार का अनुभव न हो तो ऐसे जातक को वह सलाहकार अथवा किसी अन्य रूप में सम्मिलित करे तो फिर जातक व्यापार में बहुत सफल होता है।
    ऐसा होने पर स्त्री पक्ष से आपको कम सुख मिलेगा अथवा कुछ गुप्त परेशानियां रह सकती हैं। हांलाकि विवाह के बाद यदि आपका आहार विहार नियमित और मर्यादित रहेगा तो समस्याएं नहीं होंगी। आपके खर्चे आमदनी से अधिक हो सकते हैं। हो सकता है कि आप उचित स्थान पर खर्च न करके अनुचित जगह पर खर्च करें। हो सकता है कि स्वतंत्र व्यवसाय से भी आपको बहुत लाभ न मिल पाए।
इन उपाय से होगा लाभ -
-- जातक की पत्नी को पुरुषों के जैसे कपडे नहीं पहनने चाहिए और न ही पुरुषों के जैसे बाल रखने चाहिए अन्यथा गरीबी बढती है। 
-- ऐसे जातक को उसी से विवाह करना चाहिए जिस स्त्री के भाई हों।
-- जातक स्त्री हो तो स्वयं या फिर पुरुष हो तो पत्नी अपने बालों में सोने का कि.ल लगाए। 
-- खयाल रखें कि पत्नी नंगे पैर न चले।

जाने और समझें श्री भैरव अष्टमी के महत्व और प्रभाव को

इस वर्ष भैरवाष्टमी 19 नवंबर 2019 (मंगलवार) को मनाई जाएगी। काल भैरव उत्तम तंत्र साधाना के लिए माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं में बताया गया है कि भगवान शंकर का ही भैरव बाबा अवतार हैं। भैरवाष्टमी के दिन व्रत एवं षोड्षोपचार पूजन करना अत्यंत शुभ एवं फलदायक माना जाता है। इस दिन श्री कालभैरव जी का दर्शन-पूजन शुभ फल देने वाला होता है। हमारे वैदिक ग्रंथों अनुसार श्री काल भैरव का जन्म मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष अष्टमी को प्रदोष काल में हुआ था, तब से इसे भैरव अष्टमी के नाम से जाना जाता है। इसीलिए काल भैरव की पूजा मध्याह्न व्यापिनी अष्टमी पर करनी चाहिए।
Learn and understand the importance and impact of Shri Bhairav Ashtami-जाने और समझें श्री भैरव अष्टमी के महत्व और प्रभाव को    पौराणिक कथानुसार एक बार सृष्टिकर्ता भगवान ब्रह्मा ने भगवान भोलेनाथ की वेशभूषा और उनके गणों का उपहास उड़ाया, तब उस समय भगवान शिव के क्रोध से विशालकाय दंडधारी प्रचंडकाय काया प्रकट हुई और ब्रह्मा जी का वध करने के लिए बढ़ने लगी दौड़ी। पुराणों के अनुसार, इस काया ने ब्रह्मदेव के एक शीश को अपने नाखून से काट भी दिया। तभी भगवान शिव ने बीच बचाव करते हुए उसे शांत किया गया और फिर तब से ही ब्रह्मा जी के चार शीष ही बचे। ऐसी मान्यता है कि जिस दिन यह विशाल काया प्रकट हुई थी, वह दिन मार्गशीर्ष मास की कृष्णाष्टमी का दिन था। भगवान शिव के क्रोध से उत्पन्न इस काया का नाम भैरव पड़ा। भैरव का अर्थ है भय को हरने वाला या भय को जीतने वाला। इसलिए कालभैरव रूप की पूजा करने से मृत्यु और हर तरह के संकट का भय दूर हो जाता है। शिव पुराण के अनुसार शती काल भैरव भगवान शिव का रौद्र रूप है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के उल्लेखानुसार कालभैरव श्रीकृष्ण के दाहिने नेत्र से प्रकट हुए थे, जो आठ भैरवों में से एक थे। कालभैरव रोग, भय, संकट और दुख के स्वामी माने गए हैं। इनकी पूजा से हर तरह की मानसिक और शारीरिक परेशानियां दूर हो जाती हैं।
पुराणों में बताए गए हैं 12 भैरव--- 
धर्म ग्रंथों में मिलते है | भक्तजन इनमें से किसी एक रूप की उपासना भैरव उपासक यदि सच्चे मन से कर लेते है | तो उन पर भैरव का प्रभाव पूरा -पूरा रहता है | अपने भक्तों के सारे संकट हरण करने के लिए वे स्वयं आते है |
ऐसे हैं श्री भैरव जी के सभी बारह स्वरुप (नाम)--
  • 1. बाल भैरव 
  • 2. बटुक भैरव 
  • 3. स्वर्णाकर्षण भैरव
  • भैरव जी के ये तीनों रूप सबसे सुंदर और मृदुल माने गए है | जिनमें स्वर्णाकर्षण भैरव को धन-धान्य के स्वामी और सृष्टि के पालन पोषण कर्ता के रूप पूजा जाता है | भैरव जी के ये तीनों स्वरुप पूर्णतः सात्विक माने गये है तथा भगवान विष्णु , राम , कृष्ण आदि के समान जी इन रूपों की पूजा की जाती है |
  • 4. महाकाल भैरव
  • भैरव जी के उपरोक्त तीनों स्वरुप के बिल्कुल विपरीत है –
  •  महाकाल भैरव | महाकाल भैरव को मृत्यु का देवता माना जाता है | यही काल रूप है | इस रूप को लेकर ही तंत्र साधना की जाती है | तांत्रिक सिद्धियाँ पाने के लिए भैरव जी को महाकाल भैरव के रूप में पूजा जाता है | इसलिए गृहस्थ जीवन में महाकाल भैरव की उपासना न करके बाल भैरव , बटुक भैरव और स्वर्णाकर्षण भैरव इन रूपों में पूजा की जानी चाहिए |
इनके अतिरिक्त भैरव जी के अन्य 8 रूप इस प्रकार से है ---
  • 5. असिताग भैरव
  • 6. रु रु भैरव 
  • 7. चंड भैरव
  • 8. क्रोधोन्मत भैरव
  • 9. भयंकर भैरव
  • 10. कपाली भैरव
  • 11. भीषण भैरव
  • 12. संहार भैरव
भैरव जी के ये सभी रूप सोम्य नहीं है बल्कि प्रचंड रूप है | भैरव जी को भगवान शिव का पाँचवा और रौद्र अवतार माना गया है | भैरव जी के सभी 12 रूपों में 9 रूपों को प्रचंड माना गया है | जिनकी उपासना तांत्रिक सिद्धियाँ पाने के लिए की जाती है | रविवार, बुधवार या भैरव अष्टमी पर इन 8 नामों का उच्चारण करने से मनचाहा वरदान मिलता है। भैरव देवता शीघ्र प्रसन्न होते हैं और हर तरह की सिद्धि प्रदान करते हैं। क्षेत्रपाल व दण्डपाणि के नाम से भी इन्हें जाना जाता है। 
  • इस वर्ष कालभैरव अष्टमी (जयन्ती) मंगलवार, नवम्बर 19, 2019 को मनाई जाएगी।
  • अष्टमी तिथि प्रारम्भ – नवम्बर 19, 2019 को03:35 पी एम बजे से आरम्भ होकर..
  • अष्टमी तिथि समाप्त – नवम्बर 20, 2019 को01:41 पी एम बजे होगी।

भगवान भैरव की महिमा अनेक शास्त्रों में मिलती है। भैरव जहां शिव के गण के रूप में जाने जाते हैं, वहीं वे दुर्गा के अनुचारी माने गए हैं। भैरव की सवारी कुत्ता है। चमेली फूल प्रिय होने के कारण उपासना में इसका विशेष महत्व है। साथ ही भैरव रात्रि के देवता माने जाते हैं और इनकी आराधना का खास समय भी मध्य रात्रि में 12 से 3 बजे का माना जाता है। भैरव के नाम जप मात्र से मनुष्य को कई रोगों से मुक्ति मिलती है। वे संतान को लंबी उम्र प्रदान करते है। अगर आप भूत-प्रेत बाधा, तांत्रिक क्रियाओं से परेशान है, तो आप शनिवार या मंगलवार कभी भी अपने घर में भैरव पाठ का वाचन कराने से समस्त कष्टों और परेशानियों से मुक्त हो सकते हैं।
    पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि यदि आप जन्मकुंडली में मंगल ग्रह के दोषों से परेशान हैं तो श्री भैरव की पूजा करके पत्रिका के दोषों का निवारण सरलता से कर सकते है। शनि या राहु से पीडि़त व्यक्ति अगर शनिवार और रविवार को काल भैरव के मंदिर में जाकर उनका दर्शन करें। तो उसके सारे कार्य सकुशल संपन्न हो जाते है। भैरव उपासना क्रूर ग्रहों के प्रभाव को समाप्त करती है. भैरव देव जी के राजस, तामस एवं सात्विक तीनों प्रकार के साधना तंत्र प्राप्त होते हैं। भैरव साधना स्तंभन, वशीकरण, उच्चाटन और सम्मोहन जैसी तांत्रिक क्रियाओं के दुष्प्रभाव को नष्ट करने के लिए कि जाती है। इनकी साधना करने से सभी प्रकार की तांत्रिक क्रियाओं के प्रभाव नष्ट हो जाते हैं।
   राहु केतु के उपायों के लिए भी इनका पूजन करना अच्छा माना जाता है। भैरव की पूजा में काली उड़द और उड़द से बने मिष्‍ठान्न इमरती, दही बड़े, दूध और मेवा का भोग लगाना लाभकारी है इससे भैरव प्रसन्न होते है भैरव की पूजा-अर्चना करने से परिवार में सुख-शांति, समृद्धि के साथ-साथ स्वास्थ्य की रक्षा भी होती है। तंत्र के ये जाने-माने महान देवता काशी के कोतवाल माने जाते हैं। भैरव तंत्रोक्त, बटुक भैरव कवच, काल भैरव स्तोत्र, बटुक भैरव ब्रह्म कवच आदि का नियमित पाठ करने से अपनी अनेक समस्याओं का निदान कर सकते हैं। भैरव कवच से असामायिक मृत्यु से बचा जा सकता है। ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी के अनुसार नारद पुराण में बताया गया है कि कालभैरव की पूजा करने से मनुष्‍य की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है। मनुष्‍य किसी रोग से लम्बे समय से पीड़‍ि‍त है तो वह रोग, तकलीफ और दुख भी दूर होती हैं। कालभैरव की पूजा पूरे देश में अलग-अलग नाम से और अलग तरह से की जाती है। कालभैरव भगवान शिव की प्रमुख गणों में एक हैं। सारे संकट भक्तों के भैरव बाबा की पूजा करने से खत्म होते हैं।  कहा जाता है कि बहुत मुश्किल भैरव साधना है। साथ ही सात्विकता और एकाग्रता का ध्यान भैरव बाबा की साधाना में करना होता है। पौराणिक कथाओं में कहा गया है कि भगवान शिव ने मार्गशीर्ष कृष्‍ण पक्ष अष्टमी के दिन अवतार लिया था। इस तिथि पर प्रत और पूजा इस उपलक्ष के तौर पर होती है। 
जानिए भैरव बाबा का महत्व 
हिंदू देवताओं में भैरव बाबा का बहुत महत्व माना गया है। शास्‍त्रों में कहा गया है कि भैरव बाब दिशाओं के रक्षक और काशी के संरक्षक हैं। भैरव बाबा के कई रूप में और बटुक भैरव और काल भैरव एक ही हैं। 
श्री भैरव जी के विभिन्न स्वरूप
शिवजी के रज, तम और सत्व गुणों के आधार पर श्री भैरव के स्वरूप कौन-कौन से हैं और किस मनोकामना के लिए कौन से स्वरूप की पूजा की जाती है...
  1. बटुक भैरव--यह भैरव का सात्विक और बाल स्वरूप है। जो लोग सभी सुख, लंबी आयु, निरोगी जीवन, पद, प्रतिष्ठा और मुक्ति पाना चाहते हैं, वे बटुक भैरव की पूजा कर सकते हैं।
  2. काल भैरव--यह भैरव का तामसिक स्वरूप है, लेकिन कल्याणकारी है। इस स्वरूप को काल का नियंत्रक माना गया है।इनकी पूजा अज्ञात भय, संकट, दुख और शत्रुओं से मुक्ति देने वाली मानी गई है।
  3. आनंद भैरव---यह भैरव का राजस यानी रज स्वरूप माना गया है। दस महाविद्या के अंतर्गत हर शक्ति के साथ भैरव की भी पूजा की जाती है। इनकी पूजा से धन, धर्म की सिद्धियां मिल सकती हैं।
जानिए भैरव अष्टमी के व्रत का महत्व 
शास्‍त्रों में कहा गया है कि शत्रुओं और नकारात्मक शक्तियों का नाश भैरवाष्टमी के दिन व्रत और पूजा-अर्चना करने से होता है। मान्यताओं के अनुसार,सभी तरह के पाप इस दिन भैरव बाबा की विशेष पूजा अर्चना करने से धूल जाते हैं। श्री कालभैरव जी के दर्शन और पूजा इस तिथि पर करने से शुभ फल मिलता है। 
जानिए भैरव जी की पूजा के लाभ
ऐसा कहा जाता है कि पूजा-अर्चना भैरव जी की इस दिन करने से सारी मनोकामना पूर्ण होती है। जो भक्त इस दिन भैरव बाबा की पूजा करते हैं वह निर्भय होते हैं साथ ही उनके सारे कष्ट भी दूर हो जाते हैं। भैरव बाबा की पूजा और व्रत इस दिन करने से सारे विघ्न खत्म हो जाते हैं। भूत, पिशाच एवं काल भी इनके भक्तों से दूर रहते हैं।
लाभदायक होती हरण भैरव की साधना 
ग्रहों के क्रूर प्रभाव भी भैरव बाबा की पूजा करने से खत्म होते हैं। इतना ही नहीं हर तरह की तांत्रिक क्रियाओं के प्रभाव भी भैरव बाबा की साधना से दूर होते हैं। 
ऐसे करें भैरव पूजन
षोड्षोपचार पूजन के साथ भैरव बाबा की पूजा करनी चाहिए। रात्र में जागरण करना चाहिए। भैरव कथा व आरती रात में भजन कीर्तन करते हुए करनी चाहिए ऐसा करके विशेष फल की प्राप्ति होती है। इस दिन काले कुत्ते को भोजन कराने से भैरव बाबा प्रसन्न होते हैं।

वृश्चिक राशि में देव गुरु वृहस्पति का प्रवेश, 5 महीनें रखें सावधानी

देवगुरु वृहस्पति लगभग 12 वर्षों बाद पुनः 05 नवंबर 2019 को प्रातः अपनी राशि धनु में प्रवेश कर रहे हैं। ये एक सदी में लगभग आठ बार धनु राशि की परिक्रमा करते हैं।  देव वृहस्पति ग्रह 5 नवंबर 2019, मंगलवार रात 12 बजकर 3 मिनट पर अपनी राशि धनु में गोचर करेगा और 29 मार्च 2020, रविवार शाम को 7 बजकर 8 मिनट तक इसी राशि में स्थित रहेगा। गुरु के धनु राशि में गोचर करने से 'हंस' योग बनता है। धनु और मीन राशि के स्वामी गुरु पुनर्वसु, विशाखा एवं पूर्वाभाद्रपद नक्षत्रों के भी स्वामी हैं। कर्क राशि इनकी उच्च और मकर राशि नीच संज्ञक कही गयी है। जिन जातकों की जन्मकुंडली में गुरु धनु राशि में होकर केन्द्र या त्रिकोण में होंगे उनके लिए 'हंस' योग श्रेष्ठतम फलदाई रहेगा।ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी बताते हैं कि वैदिक ज्योतिष में बृहस्पति को सर्वाधिक शुभ एवं शीघ्रफलदाई ग्रह माना गया है। जन्मकुंडली में द्वितीय, पंचम, नवम तथा एकादश भाव के कारक होते हैं।
गुरु बृहस्पति का कुंडली पर प्रभाव--
कुंडली में बृहस्पति की अनुकूल स्थिति व्यक्ति को मान सम्मान और ज्ञान प्रदान करती है तथा व्यक्ति को धन की प्राप्ति भी अच्छी मात्रा में होती है। संतान सुख की प्राप्ति के लिए भी बृहस्पति की मजबूत स्थिति को देखा जाता है। वहीं दूसरी ओर गुरु बृहस्पति जब इसके विपरीत अवस्था में होते हैं तो इन सभी कारकों में कमी आने की संभावना बढ़ जाती है। 
 Lord-Jupiter-in-Scorpio-keep-careful-for-5-months-वृश्चिक राशि में देव गुरु वृहस्पति का प्रवेश, 5 महीनें रखें सावधानी    मान-सम्मान, पद-प्रतिष्ठा, संयम, धैर्य, तरक्की, ज्ञान, सदाचरण और वैवाहिक सुख का प्रतिनिधि ग्रह बृहस्पति 5 नवंबर को सुबह अपनी राशि धनु में प्रवेश कर रहा है। वर्ष 2019 में बृहस्पति ने कई बार मार्गी-वक्री गति करते हुए आगे-पीछे की राशियों में गोचर किया। धनु राशि में चल रहे बृहस्पति 10 अप्रैल को वक्री हुए थे। वक्री गति करते हुए ये 22 अप्रैल को पिछली राशि वृश्चिक में आ गए थे। इसके बाद 11 अगस्त को वृश्चिक राशि में ही मार्गी हो गए थे। अब मार्गी गति करते हुए 5 नवंबर को पुन: अपनी ही राशि धनु में आ रहे हैं। बृहस्पति कर्क राशि में उच्च का होता है और मकर में नीच का। धनु और मीन इसकी स्वयं की राशि है। यह धनु और मीन राशि के स्वामी हैं और कर्क राशि में उच्च तथा मकर राशि में नीच अवस्था में माने जाते हैं। कुंडली में चंद्रमा लग्न पर बृहस्पति की दृष्टि अमृत समान मानी जाती है। यह स्थिति गजकेसरी योग बनाती हैं।

देव गुरु वृहस्पति ग्रह 5 नवंबर को कल धनु राशि में प्रवेश करेंगे जहाँ 30 मार्च 2020 तक  इसी राशि में रहने वाले हैं. वह 22 अप्रैल 2019 से वृश्चिक राशि में ही विराजमान थे. गुरु के राशि परिवर्तन का प्रभाव सभी राशियों के जातकों पर पड़ेगा। किसी राशि के जातक को धन का लाभ होगा तो किसी को स्वास्थ्य की परेशानी होगी। पांच राशि वालों के जीवन में बड़ा बदलाव आएगा। यह बात उज्जैन के प्रसिद्ध ज्योतिष पण्डित दयानन्द शास्त्री जी सभी राशि परिवर्तन से होने वाले असर के बारे में बताते हुए कही
जीवन में बदलाव लाएगा--
उज्जैन के प्रसिद्ध ज्योतिषी पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि भारतीय वैदिक ज्योतिष के अंतर्गत ग्रहों में बृहस्पति को देवताओं का गुरु कहा गया है और ग्रहों के मंत्रिमंडल में इन्हें मंत्री का पद प्राप्त है। ये नैसर्गिक रूप से सब से शुभ ग्रह माने जाते हैं। यह वृद्धि के कारक हैं इसलिए अच्छी या बुरी जो भी घटना हो उसमें इनका योग वृद्धि कारक होता है। यह हमारे जीवन में हमारे गुरु और गुरु तुल्य लोगों, हमारे परिवार के बड़े बुजुर्गों, संतान, धन तथा ज्ञान का कारक प्राप्त है। जन्म कुंडली में गुरु की स्थिति से जातक के जीवन के बारे में कई महत्वपूर्ण बातें पता चलती हैं। इसलिए यह राशि परिवर्तन कई तरह से जीवन में बदलाव लाएगा।
     गुरु एक राशि में करीब एक साल रहते हैं इसलिए 12 साल के बाद फिर से अपनी राशि धनु में लौटते हैं। 5 नवंबर को गुरु सुबह  अपनी राशि धनु में लौट रहे हैं। अपनी राशि धनु में गुरु अगले साल 2020 मार्च तक रहेंगे। इस राशि में गुरु का स्वागत दो पाप ग्रह केतु और शनि करेंगे। शनि और केतु से साथ गुरु का संयोग यूं तो शुभ नहीं है फिर भी गोचर के अनुसार कुछ राशियों को इसका परिवर्तन शुभ लाभ  होगा तो किसी को होगा नुकसान. ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी से जानते हैं कि अगले 5 महीने किन किन राशि वालों को सबसे अधिक सावधान रहने की आवश्यकता है।
  1. मेष राशि- मेष राशि से नवम भाव में गुरु का गोचर रुके हुए कार्यों को पूरा करने के साथ-साथ भाग्य में वृद्धि करेगा तथा मनचाहा परिणाम देगा. इस राशि के लिए बृहस्पति नवम भाव में गोचर करेगा। इस राशि वालों को अपने कर्मों के अनुसार फल प्राप्त होता। इस राशि के लिए बृहस्पति भाग्योदकारी है। नौकरी में प्रमोशन, व्यापार में लाभ मिलेगा। पारिवारिक जीवन अच्छा रहेगा। घर में नए मेहमान आएंगे। आर्थिक मामलों के लिए वक्त शुभ रहेगा। आपको कई स्रोतों से धन की प्राप्ति हो सकती है। धार्मिक कार्यों में रुचि होगी। धार्मिक यात्राओं पर जा सकते हैं। तीर्थयात्रा हो सकती है. सत्संग का लाभ मिलेगा. पार्टी व पिकनिक का कार्यक्रम बन सकता है. स्वादिष्ट भोजन का आनंद प्राप्त होगा. रचनात्मक कार्य सफल रहेंगे. पठन-पाठन व लेखन के काम में मन लगेगा. धन प्राप्ति सुगम होगी. पारिवारिक सुख-शांति बनी रहेगी. जल्दबाजी न करें.
  2. वृषभ राशि- इस राशि के लिए बृहस्पति का गोचर अष्टम भाव में होगा। इससे कुछ परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। सेहत का विशेष ध्यान रखना होगा। पेट संबंधी रोग आ सकते हैं। अनचाही यात्राएं होंगी। आर्थिक पक्ष कमजोर रहेगा। धन संचय करने में परेशानी आ सकती है। उधार चुकाने का दबाव रहेगा। व्यापार में मनचाहे परिणाम प्राप्त करने के लिए कड़ी मेहनत करना पड़ेगी। धार्मिक कार्यों की ओर रूझान बढ़ेगा। रोजगार में वृद्धि होगी. प्रतिद्वंद्वी सक्रिय रहेंगे. शारीरिक कष्ट की वजह से बाधा संभव है. उन्नति के मार्ग प्रशस्त होंगे. आय में वृद्धि होगी. वरिष्ठ जनों का सहयोग तथा मार्गदर्शन प्राप्त होगा. पार्टनरों से मतभेद दूर होंगे. कुसंगति से हानि होगी. विवेक से कार्य करें।
  3. मिथुन राशि- इस राशि के लिए बृहस्पति का गोचर सप्तम स्थान में रहेगा। इस समय आपका वैवाहिक जीवन सुखद रहेगा। वैवाहिक जीवन में चल रहे मतभेद दूर होंगे। आर्थिक स्थिति के लिए समय उत्तम है। पार्टनरशिप में कोई नया कार्य प्रारंभ करना चाहते हैं तो अवश्य करें लाभ होगा। प्रेम संबंधों में नयापन आएगा। नौकरी में तरक्की, बिजनेस में लाभ की स्थिति मिलेगी। समाज में सम्मान प्राप्त होगा। अप्रत्याशित खर्च सामने आएंगे. किसी व्यक्ति के व्यवहार से मन खिन्न रहेगा. पुराना रोग उभर सकता है. दूर का समाचार मिल सकता है. चिंता तथा तनाव में वृद्धि होगी. पार्टनरों तथा मातहतों से मतभेद बढ़ सकते हैं. दूसरों से अपेक्षा न करें. आय में निश्चितता रहेगी.
  4. कर्क राशि- इस राशि के लिए बृहस्पति छठे भाव में गोचर करेगा। कर्क राशि में बृहस्पति उच्च का होता है। इसलिए इसका शुभ प्रभाव मिलने वाला है। इस राशि के जो लोग शत्रुओं से परेशान हैं, उनकी यह परेशानी शीघ्र दूर होगी। रोगों से मुक्ति मिलने का समय है। हालांकि मानसिक रूप से मजबूत रहना होगा कोई अनपेक्षित घटना हो सकती है। वैवाहिक जीवन के लिए समय ठीक है। आर्थिक स्थिति में मजबूती आएगी। थोड़े प्रयास से ही कार्य बनेंगे. सामाजिक प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी. सामाजिक कार्य करने का अवसर मिलेगा. धन प्राप्ति सुगम होगी. संतान पक्ष से कोई खराब सूचना मिल सकती है. चिंता तथा तनाव रहेंगे. प्रतिद्वंद्वी शांत रहेंगे. विवाद से स्वाभिमान को ठेस पहुंच सकती है. जोखिम न लें.
  5. सिंह राशि- इस राशि के लिए बृहस्पति पंचम स्थान में गोचर करने जा रहा है। अपने मित्र सूर्य की राशि में मार्गी गुरु का प्रवेश इसके लिए शुभ रहेगा। इस राशि के जातकों की पारिवारिक स्थिति सुखद रहेगी। आर्थिक पक्ष मजबूत होगा। कर्ज मुक्ति की स्थिति बन रही है। संतान पक्ष की चिंता दूर होगी। संतानों के विवाह की बात बनेगी। नौकरीपेशा को सम्मान, व्यापारियों को कार्य विस्तार का सुख प्राप्त होगा। परिवार में अतिथियों का आगमन होगा. शुभ समाचार प्राप्त होंगे. आत्मविश्वास में वृद्धि होगी. कोई नया काम करने की योजना बन सकती है. व्यवसाय ठीक चलेगा. थकान महसूस होगी. आलस्य हावी रहेगा. बेचैनी रहेगी. पारिवारिक सहयोग प्राप्त होगा. मतभेद कम होंगे. जल्दबाजी न करें।
  6. कन्या राशि- इस राशि के लिए गुरु का गोचर चतुर्थ स्थान में होगा। चतुर्थ स्थान सुख स्थान होता है, इसलिए यहां पर बृहस्पति का मार्गी होना इस राशि वालों को अनेक प्रकार के सुख प्रदान करेगा। पारिवारिक जीवन में मधुरता तो आएगी ही, जो लोग वैवाहिक सुख की प्रतीक्षा कर रहे हैं उनकी इच्छा पूरी होने वाली है। भौतिक सुख-सुविधाओं में वृद्धि होगी। स्वयं पर खर्च करेंगे। पर्यटन का अवसर आएगा। दोस्तों के साथ मेल मुलाकात होगी। भाग्योन्नति के प्रयास सफल रहेंगे. यात्रा मनोरंजक रहेगी. सुखमय जीवन व्यतीत होगा. किसी बड़ी समस्या का हल मिलेगा. प्रसन्नता रहेगी. धन प्र‍ाप्ति सुगम होगी. वरिष्ठजनों का सहयोग तथा मार्गदर्शन प्राप्त होगा. अप्रत्याशित लाभ हो सकता है. ऐश्वर्य के साधनों पर बड़ा खर्च होगा.
  7. तुला राशि- इस राशि के लिए गुरु मार्गी तृतीय स्थान में होगा। भाई-बंधुओं के साथ रिश्ते सुधरेंगे। पैतृक संपत्ति को लेकर चल रहे विवाद सुलझने की स्थिति में आ जाएंगे। अभी तक आपकी जो योजनाएं आगे नहीं बढ़ पा रही थीं, उन्हें गति मिलेगी। सम्मान और सुख प्राप्त होगा। सेहत के लिहाज से यह गोचर ठीक नहीं रहेगा। मस्तिष्क संबंधी रोग उभर सकते हैं। पेट के निचले हिस्से के रोग भी परेशान करेंगे। संतान पक्ष की चिंता रहेगी। मशीनरी से चोट लग सकती है। इस राशि के जातकों को वैवाहिक प्रस्ताव मिल सकता है. अप्रत्याशित खर्च सामने आएंगे. बनते कामों में विघ्न आ सकते हैं. कर्ज लेना पड़ सकता है. स्वास्थ्य कमजोर रहेगा. काम में मन नहीं लगेगा. पार्टनरों से मतभेद हो सकता है. जोखिम व जमानत के कार्य टालें. कीमती वस्तुएं संभालकर रखें. विवाद न करें.
  8. वृश्चिक राशि- इस राशि के लिए बृहस्पति का गोचर द्वितीय स्थान में हो रहा है। धन स्थान में बृहस्पति का बैठना शुभ संकेत है। आपकी आर्थिक योजनाओं को गति मिलेगी। नया कार्य व्यवसाय प्रारंभ करना चाहते हैं या पुराने को विस्तार देना चाहते हैं तो समय अच्छा है। इस दौरान किसी बड़े प्रोजेक्ट के पूरे हो जाने से मानसिक सुख-श्ाांति प्राप्त होगी। वैवाहिक जीवन में मधुरता आएगी। प्रेम संबंध में अनुकूलता प्राप्त होगी, लेकिन पार्टनर के साथ पारदर्शी व्यवहार करना होगा। कानूनी अड़चन आ सकती है. वाणी पर नियंत्रण रखें. बकाया वसूली के प्रयास सफल रहेंगे. शारीरिक कष्ट संभव है. बेचैनी रहेगी. मनोरंजक यात्रा होगी. धनलाभ के अवसर हाथ आएंगे. लेन-देन में जल्दबाजी न करें. भाइयों से सहयोग मिलेगा. घर में सुख-शांति बनी रहेगी.
  9. धनु राशि- इसी राशि में बृहस्पति आ रहा है और यह लग्न यानी प्रथम स्थान है। यहां पर बृहस्पति के मार्गी होने से शारीरिक दिक्कतें दूर होंगी। सुख-सौभाग्य प्राप्त होगा। धन की तंगी दूर होने की स्थिति बनेगी और आय के एक से अधिक साधन प्राप्त होंगे। सेहत के लिहाज से यह गोचर अच्छा साबित होगा। बीमारियों पर हो रहे खर्च में कमी आएगी। जीवनसाथी के साथ पर्यटन का मौका आएगा। शत्रुओं को परास्त करने में कामयाब होंगे। सभी कार्य आपके मनोनुकूल होंगे। मानसिक द्वंद्व रहेगा. चोट व रोग से बचें. अपरिचितों पर विश्वास न करें. जल्दबाजी न करें. नई योजना बनेगी. नए कार्य प्रारंभ करने का मन बनेगा. व्यवसाय में अनुकूलता रहेगी. मित्रों के साथ अच्‍छा समय गुजरेगा. प्रसन्नता रहेगी. मनोरंजन के अवसर मिलेंगे. भाग्य का साथ मिलेगा.
  10. मकर राशि- इस राशि के लिए द्वादश स्थान में मार्गी बृहस्पति का आना मिलाजुला प्रभाव दिखाएगा। चूंकि द्वादश स्थान व्यय भाव होता है इसलिए खर्च में निश्चित तौर पर बढ़ोतरी होगी, लेकिन ध्यान रखना होगा कि यह खर्च कहां हो रहा है। अनावश्यक कार्यों पर खर्च करने से खुद को रोकना होगा। आय के साधनों में वृद्धि होगी। कोई ऐसा कार्य प्राप्त होने के योग बन रहे हैं जो आपके धन भंडार में वृद्धि करेगा। पारिवारिक जीवन सुखद रहेगा। सेहत बेहतर रहेगी। तीर्थ दर्शन हो सकता है. सत्संग का लाभ मिलेगा. प्रभावशाली व्यक्तियों से मेलजोल बढ़ेगा. कार्य की बाधा दूर होगी. व्यापार-व्यवसाय मनोनुकूल रहेगा. पारिवारिक सहयोग मिलेगा. कुछ तनाव भी हो सकता है. थकान हो सकती है. परिस्थिति अनुकूल रहेगी. जल्दबाजी न करें.
  11. कुंभ राशि- कुंभ राशि के लिए एकादश भाव में मार्गी बृहस्पति के आने से स्थितियों में सुधार आएगा। अब तक जो भागदौड़ और जीवन में अनिश्चितता बनी हुई थी वह दूर हो जाएगी। अपने बारे में कोई अच्छा निर्णय ले पाएंगे। हालांकि अभी भी कोई बड़ा निवेश करने से बचना होगा। खासकर वाहन, मशीनरी के कार्यों में निवेश करें। मान-सम्मान, पद-प्रतिष्ठा में अवश्य वृद्धि होगी। अविवाहितों को विवाह सुख की प्राप्ति होगी।प्रेम-प्रसंग में अनुकूलता रहेगी. कामकाज मनमाफिक चलेगा. प्रसन्नता रहेगी. प्रभावशाली व्यक्तियों का सहयोग मिलेगा. जल्दबाजी से का‍म बिगड़ सकते हैं. पारिवारिक संबंधों में प्रगाढ़ता आएगी. सुख-शांति बनी रहेगी. वाणी में हल्के शब्दों के प्रयोग से बचें. सुख के साधनों पर खर्च होगा.
  12. मीन राशि- यह राशि चक्र की अंतिम राशि हैं। मीन राशि के लिए मार्गी बृहस्पति का गोचर दशम स्थान में होगा। कार्य स्थान में बृहस्पति का शुभ प्रभाव मिलेगा। जिनके पास नौकरी नहीं है उन्हें नौकरी मिलेगी। बिजनेस प्रारंभ करने के लिए सही वक्त है, कार्य विस्तार करें। प्रॉपर्टी और वाहन में निवेश फलेगा। सेहत में सुधार आएगा। परिवार के बुजुर्गों के सहयोग से सही निर्णय ले पाएंगे। मित्रों, भाई-बंधुओं के साथ संबंधों में सुधार आएगा। पारिवारिक समागम का अवसर आएगा।कष्ट, भय, तनाव व चिंता का वातावरण बन सकता है. जोखिम व जमानत के कार्य टालें. वाहन व मशीनरी के प्रयोग में विशेष सावधानी रखें. दूसरों के झगड़ों में न पड़ें. कीमती वस्तुएं गुम हो सकती हैं. आय में निश्चितता रहेगी. व्यवसाय ठीक चलेगा. नौकरी में सह‍कर्मियों से विवाद संभव है।
बृहस्पति ग्रह की शांति के कुछ उपाय ---
ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि ज्योतिष शास्त्र के अनुसार अगर आपकी कुंडली में बृहस्पति अनुकूल अवस्था में नहीं है तो आपको पुखराज रत्न धारण करना चाहिए।
- बृहस्पति धनु और मीन राशियों के स्वामी हैं इसलिए अगर इन दोनों राशियों के जातक पुखराज धारण करें तो उन्हें शुभ फल मिलते हैं। इसके साथ ही बृहस्पति ग्रह के अच्छे फल प्राप्त करने के लिए गुरुवार के दिन या बृहस्पति की होरा में गुरु यंत्र को अपने घर में स्थापित करना चाहिए। आप गुरु ग्रह के शुभ परिणाम प्राप्त करने के लिए पीपल की जड़ को गुरु की होरा या गुरु के नक्षत्रों में भी धारण कर सकते हैं।
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