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महाशिवरात्रि पर बन रहे हैं तीन महासंयोग, शिव आराधना का मिलेगा विशेष लाभ

Three-Mahayoga-are-being-organized-on-Mahashivratri-on-21-February-2020- महाशिवरात्रि पर बन रहे हैं तीन महासंयोग, शिव आराधना का मिलेगा विशेष लाभशिव आराधना का मिलेगा विशेष लाभ

शिव आराधना का महाशिवरात्रि पर्व है 21 फरवरी 2020 को शश, सुस्थिर व सर्वार्थ सिद्धि जैसे शुभ योगों के बीच मनेगा। इन योगों के चलते इस दिन की शुभता में बढ़ोतरी होगी, वही श्रद्धालुओं द्वारा की गई साधना उपासना का उन्हें कई गुना पुण्य फल प्राप्त होगा। शिवालयों में इस दिन भगवान भोलेनाथ की विशेष पूजा अर्चना, जलाभिषेक व रात्रि जागरण के आयोजन होंगे। 
     महाशिवरात्रि पर इस बार 29 वर्षों बाद शश योग बन रहा हैं।  इसका कारण यह है कि शनि 29 साल बाद अपनी राशि मकर में है। इसी तरह गुरु भी अपनी राशि धनु में स्थित है। ऐसी स्थिति और चंद्र शनि के 1,4,7 या दसवें स्थान पर होने पर यह योग निर्मित होता है। इस योग में की गई पूजा जातक के लिए विशेष फलदायी होती है। इस दिन सर्वार्थसिद्धि व सुस्थिर योग भी रहेंगे। 
    पण्डित दयानन्द शास्त्री जी बताते हैं कि श्रवण नक्षत्र और चतुर्दशी के एक साथ होने पर यह योग बनते हैं। यह दोनों योग भी शुभ माने गए हैं। इस दिन की गई पूजा का विशेष फल मिलता है। ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि इस वर्ष महाशिवरात्रि पर सर्वार्थ सिद्धि योग का संयोग भी रहेगा। इस योग में भगवान शिव-पार्वती की पूजा-अर्चना को श्रेष्ठ माना गया है। महाशिवरात्रि को शिव पुराण और महामृत्युंजय मंत्र का जाप करना चाहिए। 
शिवरात्रि की शुभता में बढ़ोतरी करेगा तीन योगों का संयोग
इस महाशिवरात्रि पर चंद्र शनि की मकर में युति के साथ पंच महापुरुष योग बन रहा है, इसे शश योग भी कहते हैं। श्रवण नक्षत्र में आने वाली शिवरात्रि और मकर राशि के चंद्रमा का योग बनती है। यह संयोग शनि के मकर राशि में होने से और चंद्र का गोचर क्रम में शनि के अधिपत्य वाली मकर राशि में होने से शश योग का संयोग बन रहा है। इस दिन रात्रि के चारों प्रहर में शिव पूजा करना चाहिए।
शिवरात्रि है सिद्धि रात्रि
शश योग कई जातकों की कुंडली में भी होता है। इस योग वाले जातकों को शिवरात्रि पर शिव की विशेष उपासना का श्रेष्ठ फल प्राप्त होता है और जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती है। यह योग हंस योग, मालव्य व रूचक योग की बातें उतना ही विशेष होता है। साधना की सिद्धि के लिए दीपावली के बाद महाशिवरात्रि को सिद्धी रात्रि माना गया है।
      इस वर्ष 2020 में महाशिवरात्रि की दूसरी विशेष बात ये है कि महाशिवरात्रि के पावन दिन पर सर्वार्थ सिद्धि योग भी बन रहा है। जिसमें शुभ कार्य संपन्न करने से लाभ मिलता है। इसी के साथ 117 साल बाद शनि और शुक्र का दुर्लभ योग भी महाशिवरात्रि के दिन बन रहा है। इस शिवरात्रि शनि अपनी राशि मकर में मौजूद रहेंगे और शुक्र अपनी उच्च राशि मीन में रहेंगे। बताया जा रहा है कि ये स्थिति 1903 में बनी थी। इस योग के कारण भगवान शिव की अराधना करने से शनि, गुरु और शुक्र ग्रह मजबूत होंगे।
    ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी के अनुसार महाशिवरात्रि के दिन श्रद्धालुओं को ज्यादा से ज्यादा दान देने से पुण्य मिलता है. इसके साथ ही महाशिवरात्रि के अवसर पर साधु-संतों के साथ ब्राह्मणों और गरीबों को भोजन कराकर वस्त्र दान करना चाहिए. साथ ही गायों को हरा चारा खिलाना भी शुभ माना जाता है।  महाशिवरात्रि के अवसर पर पक्षियों को दाना डालने के साथ कुंडली लगाना भी शुभ माना जाता है ।
साथ ही इस दिन पीपल को जल चढ़ाने से भी शुभ फल की प्राप्ति होती है। इसके साथ साथ शिव पुराण और महामृत्युंजय मंत्र का जाप करना भी शुभफल दाई होता है।

जाने और समझें शुक्र एवम शुक्र के कारण होने वाले रोगों को

वैदिक ज्योतिष में शुक्र ग्रह को एक शुभ ग्रह माना गया है। इसके प्रभाव से व्यक्ति को भौतिक, शारीरिक और वैवाहिक सुखों की प्राप्ति होती है। इसलिए ज्योतिष में शुक्र ग्रह को भौतिक सुख, वैवाहिक सुख, भोग-विलास, शौहरत, कला, प्रतिभा, सौन्दर्य, रोमांस, काम-वासना और फैशन-डिजाइनिंग आदि का कारक माना जाता है। 
समझें शुक्र एवम शुक्र के प्रभाव को--
ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि शुक्र, वृषभ और तुला राशि का स्वामी होता है और मीन इसकी उच्च राशि है, जबकि कन्या इसकी नीच राशि कहलाती है। शुक्र को 27 नक्षत्रों में से भरणी, पूर्वा फाल्गुनी और पूर्वाषाढ़ा नक्षत्रों का स्वामित्व प्राप्त है। ग्रहों में बुध और शनि ग्रह शुक्र के मित्र ग्रह हैं और तथा सूर्य और चंद्रमा इसके शत्रु ग्रह माने जाते हैं। शुक्र का गोचर 23 दिन की अवधि का होता है अर्थात शुक्र एक राशि में क़रीब 23 दिन तक रहता है।
        ज्योतिष में धन और लक्ष्मी का कारक शुक्र ग्रह को माना गया है। सबसे ज्यादा धन देने में यही ग्रह समर्थ है। शुक्र ग्रह को शुक्राचार्य/दैत्याचार्य भी कहाँ जाता है। वृषभ और तुला राशि का स्वामी शुक्र ही होता है। तुला राशि शुक्र की मूल त्रिकोण अर्थात सबसे प्रिय राशि है। व्यय भाव अर्थात पत्रिका का 12वां स्थान इसकी सबसे प्रिय जगह है। 12वीं राशि मीन में यह उच्च राशि का होता है। इस ग्रह को भोग प्रिय ग्रह कहा गया है। इसलिये पत्रिका के बारहवें भाव जिसे खर्च, शय्या स्थान भी कहा जाता है, वहां यह ग्रह सबसे शानदार परिणाम देता है। यदि आपकी कुंडली में यह ग्रह अच्छी स्थिति में है तो आपको शानदार जीवन जीने को मिलेगा। शुक्र की नीच राशि कन्या होती है। जहा ये ग्रह अच्छे परिणाम नही देता।

शुक्र की शुभ स्थिति--

Know-and-understand-the-diseases-caused-by-Venus-जाने और समझें शुक्र एवम शुक्र के कारण होने वाले रोगों कोपत्रिका में वृषभ, तुला तथा मीन राशि का शुक्र हो तो जातक यदि दरिद्र परिवार में भी जन्मा हो तो अमीर बन जाता है। यदि किसी भी राशि का शुक्र बारहवें भाव में हो तो जातक को वैभवपूर्ण जीवन जीने कॊ मिल ही जाता है। यदि पत्रिका के 6ठे भाव मॆ स्थित होकर भी यह ग्रह जब 12वे स्थान कॊ देखता है तो अच्छे परिणाम देता है। पत्रिका के दूसरे तथा सातवें मॆ बैठा शुक्र शादी के बाद आर्थिक स्थिति को शानदार कर देता है।

पत्नी, प्रेमिका व सुंदर वाहन--

शुक्र ग्रह को प्रेमिका माना गया है। संसार मॆ समस्त तरह का प्रेम इसी ग्रह से देखा जाता है।राधा कृष्ण का दिव्य प्रेम शुक्र ग्रह से ही सम्भव है। संसार मॆ समस्त सुंदरता इस ग्रह से ही है।शानदार तथा महँगे वाहन, मकान इस ग्रह की कृपा से ही सम्भव है।

शनि का परम मित्र हैं शुक्र--

जीवन मॆ कड़ी मेहनत से ही लक्ष्मी प्राप्ति होती है चाहे वह कर्म कैसा भी हो। हां एक बात अवश्य है की आपके कर्मफल भोगना पड़ता है। शनि व शुक्र का विशेष प्रेम है शुक्र की राशि तुला मॆ शनि उच्च राशि का होता है। यानी आपने जी तोड़ परिश्रम किया है तो लक्ष्मी कृपा आपको अवश्य प्राप्त होगी।

स्वच्छता पसंद है शुक्र ग्रह को--

दीवाली के पहले लक्ष्मी पूजन के लिये हम सभी जगह सफाई करते है रंग रोगन भी करते है साफ वस्त्र पहनते है। इस तरह हम शुक्र ग्रह को अपने अनुकूल बनाने का प्रयास करते हैं। यदि आप स्वच्छ रहते है (निर्धन भी स्वच्छ रह सकता है) तथा कड़ी मेहनत करते है तो निश्चित रूप से आप पर लक्ष्मी मां की कृपा होगी।
भगवान विष्णु, लक्ष्मी तथा भ्रगु ऋषि में समझौता
मां लक्ष्मी हमेशा क्षीरसागर में शेषनाग में विश्राम कर रहे भगवान विष्णु की चरण सेवा करती हैं। एक बार त्रिदेव के क्रोध की परीक्षा हेतु ऋषि भ्रगु ने क्षीरसागर में शयन कर रहे भगवान विष्णु के वक्षस्थल पर प्रहार किया था। जिससे रुष्ट होकर माता लक्ष्मी ने ब्राह्मणों कों दरिद्र होने का शाप दिया। बदले में भ्रगु ने भी मां लक्ष्मी को श्राप दिया। इस झगडे को भगवान विष्णु ने सुलझाया। उन्होने कहा, जहाँ ब्राह्मण अपनी पूजापाठ व आशीर्वाद देगा वहा लक्ष्मी को आना ही पड़ेगा साथ ही जो व्यक्ति ब्राह्मणों को दान देगा उसे ही लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होगी।
     ज्योतिषीय ग्रंथों में शुक्र को भोग का कारक ग्रह माना गया है। इसका प्रभाव जातक के भोग करने पर अधिक पड़ता है। उसे जननेन्द्रिय सम्बन्धी रोगों का अधिक सामना करना पड़ता है।  जब जन्म पत्रिका में शुक्र निर्बल अथवा पीड़ित हो अथवा शुक्र के गोचर काल में जातक को गुप्त रोग, जननेन्द्रिय के पूर्ण रोग, स्त्रियों को प्रदर संतान बंध्यत्व, स्तन रोग, वक्ष ग्रन्थि, पुरुष को शीघ्रपतन, लिंग सिकुड़ना, उपदंश, मूत्र संस्थान के रोग, दवा की विपरीत प्रतिक्रिया, कैंसर, गंडमाला, अधिक सम्भोग के बाद कमजोरी अथवा चन्द्र व चतुर्थ भाव के पीड़ित होने पर हृदयाघात भी हो सकता है। 
खगोलीय दृष्टि से शुक्र ग्रह का महत्व---
खगोल विज्ञान के अनुसार, शुक्र एक चमकीला ग्रह है। अंग्रेज़ी में इसे वीनस के नाम से जाना जाता है। यह एक स्थलीय ग्रह है। शुक्र आकार तथा दूरी में पृथ्वी के निकटतम है। कई बार इसे पृथ्वी की बहन भी कहते हैं। इस ग्रह के वायु मंडल में सर्वाधिक कार्बन डाई ऑक्साइड गैस भरी हुई है। इस ग्रह से संबंधित दिलचस्प बात यह है कि शुक्र सूर्योदय से पहले और सूर्यास्त के बाद केवल थोड़ी देर के लिए सबसे तेज़ चमकता है। इसी कारण इसे भोर का तारा या सांझ का तारा कहा जाता है।
         इस प्रकार आप समझ सकते हैं कि खगोलीय और धार्मिक दृष्टि के साथ साथ ज्योतिष में शुक्र ग्रह का महत्व कितना व्यापक है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार ऐसा कहा जाता है कि किसी व्यक्ति की जन्म कुंडली में स्थित 12 भाव उसके संपूर्ण जीवन को दर्शाते हैं और जब उन पर ग्रहों का प्रभाव पड़ता है तो व्यक्ति के जीवन में उसका असर भी दिखाई देता है।
धार्मिक दृष्टि से शुक्र ग्रह का महत्व --
पौराणिक मान्यता के अनुसार, शुक्र ग्रह असुरों के गुरू हैं इसलिए इन्हें शुक्राचार्य भी कहा जाता है। भागवत पुराण में लिखा गया है कि शुक्र महर्षि भृगु ऋषि के पुत्र हैं और बचपन में इन्हें कवि या भार्गव नाम से भी जाना जाता था। पण्डित दयानन्द शास्त्री जी के अनुसार ज्योतिष शास्त्रों में शुक्र देव के रूप का वर्णन कुछ इस प्रकार किया गया है - शुक्र श्वेत वर्ण के हैं और ऊँट, घोड़े या मगरमच्छ पर सवार होते हैं। इनके हाथों में दण्ड, कमल, माला और धनुष-बाण भी है। शुक्र ग्रह का संबंध धन की देवी माँ लक्ष्मी जी से है, इसलिए हिन्दू धर्म के अनुयायी धन-वैभव और ऐश्वर्य की कामना के लिए शुक्रवार के दिन व्रत धारण करते हैं।

गुरु कृपा प्राप्त करे--

यदि आप धन लक्ष्मी प्राप्त करना चाहते है तो इसके लिये आपको कड़ी मेहनत, स्वच्छता के अलावा गुरु, ब्राह्मण कृपा व आशीर्वाद आवश्यक है। यदि ब्राह्मण और गुरु रुष्ट है तो आपकी लक्ष्मी अन्यत्र चली जायगी। ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी बताते हैं कि शुक्र के रोग भाव के स्वामी के साथ होने पर जातक को नेत्र में चिन्ह बनता है। शुक्र की महादशा तथा शुक्र की अन्तर्दशा में जातक को विभिन्न रोग हो सकते हैं। 
  • शुक्र यदि द्वितीय भाव में है तो हृदयरोग, नेत्रकष्ट, मानसिक समस्या, चोरी के कारण धन हानि, राजप्रकोप अथवा शत्रु प्रबल होते हैं।
  • शुक्र तृतीय अथवा एकादश भाव में होने पर राजा अर्थात् उच्चाधिकारी से दण्ड, अग्निकाण्ड, भाई से कष्ट तथा कई अन्य कष्ट हो सकते हैं।
  •  शुक्र त्रिकोण अर्थात् लग्न, पंचम अथवा नवम भाव में होने पर जातक अपनी बुद्धि का सही प्रयोग नहीं कर पाता है। वह सदैव शंका व संशय में रहता है शारीरिक व मानसिक कष्ट भी प्राप्त होते हैं। इस स्थिति की सम्भावना
  • शुक्र के 4-6-8 अथवा 12वें भाव में होने पर अथवा शुक्र गोचरवश इन भावों में आने पर ही अधिक होती है।

आप यह न समझें कि यदि आपकी पत्रिका में शुक्र पापी है तो आपको केवल यही रोग होंगे, रोग होने में शुक्र किस भाव में तथा किस राशि में स्थित है, इस बात का भी बहुत असर होता है। यहां पर हम पत्रिका में शुक्र किस राशि में होने पर किस रोग की सम्भावना अधिक होती है। इसकी इस लेख द्वारा जानकारी प्राप्त करेंगे।
  1. शुक्र यदि मेष राशि में हो तो जातक को शिरोरोग, शूल, नेत्र रोग तथा सिर पर चोट का भय होता है।
  2. शुक्र के वृषभ राशि में होने पर जातक को तभी रोग होते हैं, जब शुक्र अत्यधिक पीड़ित हो। इनमें आहार नली का संक्रमण, गलसुए, टान्सिल्स, मुख व जिव्हा पर छाले जैसे रोग अधिक होते हैं।
  3. शुक्र के मिथुन राशि में होने पर जातक को गुप्त रोग, चेहरे पर मुंहासे आदि होते हैं। यदि लग्नस्थ शुक्र है तो चर्मविकार के साथ रक्त विकार की भी सम्भावना होती है।
  4. शुक्र के कर्क राशि में होने पर जातक को जलोदर, वक्ष सूजन, अपच, वमन अथवा जी मिचलाने जैसे रोग होते हैं। मंगल की दृष्टि होने पर अक्सर शरीर में जल की कमी से ग्लूकोज की बोतलें चढ़ती हैं।
  5. शुक्र के सिंह राशि में होने पर जातक को हृदयविकार, रीढ़ की हड्डी की पीड़ा व रक्त धरमनियों के रोग अथवा धमनी रक्त का थक्का जमने से हृदयाघात का योग बनता है।
  6. शुक्र के कन्या राशि में होने पर जातक को खूनी अतिसार, थोड़ा भी खाते ही शौच जाना तथा भोजन का न पचना जैसे रोग उत्पन्न होते है। 
  7. शुक्र के तुला राशि में होने पर जातक को मूत्र संस्थान के रोग, शीघ्रपतन तथा गुरु के भी पीड़ित होने पर मधुमेह जैसे रोग होते हैं।
  8. शुक्र के वृश्चिक राशि में होने पर पुरुष जातक को अण्डकोष के रोग, अल्पवीर्यता, हर्निया की शल्य क्रिया, उपदंश तथा स्त्री जातक को गर्भाशय संक्रमण योनिरोग, श्वेत प्रदर व गुदाद्वार के रोग होते हैं।
  9. शुक्र के धनु राशि में होने पर जातक को गुदा रोग अथवा शल्य क्रिया, फिशर, गुप्तेन्द्रिय रोग, स्नायु रोग, कमर की पीड़ा, दुर्घटना में कमर उतरना जैसे रोग अधिक होते हैं।
  10. शुक्र के मकर राशि में होने पर जातक को घुटनों की पीड़ा व सूजन, त्वचा रोग, कमर से निचले हिस्से में पीड़ा व स्नायु विकार के रोग होते हैं।
  11. शुक्र के कुंभ राशि में होने पर जातक को रक्तवाहिका के रोग, घुटने में पीडा अथवा सूजन, रक्तविकार स्फूर्ति में कमी, काम में मन न लगना आदि रोग होते हैं।
  12. शुक्र मीन राशि में होने पर जातक को पैरों के पंजों के रोग अधिक होते हैं। तथा गुरु के भी पीड़ित होने पर मधुमेह रोग की संभावना बढ़ जाती है।
जानिए शुक्र ग्रह के मंत्र -

शुक्र का वैदिक मंत्र---
ॐ अन्नात्परिस्त्रुतो रसं ब्रह्मणा व्यपिबत् क्षत्रं पय: सोमं प्रजापति:।
ऋतेन सत्यमिन्द्रियं विपानं शुक्रमन्धस इन्द्रस्येन्द्रियमिदं पयोऽमृतं मधु।।

शुक्र का तांत्रिक मंत्र---
ॐ शुं शुक्राय नमः

शुक्र का बीज मंत्र---
ॐ द्रां द्रीं द्रौं सः शुक्राय नमः

क्या होगा यदि शुक्र स्थित हो रोग/ऋण/शत्रु (6ठे भाव में) तो --
शुक्र की इस भाव में स्थिति आपके कुल की श्रेष्ठता का द्योतक हो सकती है। आप सुशिक्षित और विवेकवान हो सकते हैं। लेकिन यहां स्थित शुक्र आपको डरपोक बना सकता है अथवा आपको स्त्रियों से अप्रियता भी मिल सकती है। गुरुजनों से भी आपका विरोध रह सकता है। पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि इस भाव में शुक्र के शुभ फल अधिक मिलते हैं, मतान्तर से शुक्र यहाँ निष्फल होता है लेकिन अधिक मत शुक्र के शुभ फल देने के हैं। शुक्र के निष्फल होने के मत में जातक शारीरिक रूप से सुखहीन, दुराचारी, अधिक मित्र वाला, मूत्र रोग से ग्रसित, विपरीत लिंग में प्रिय, गुप्तरोगी, समस्त प्रकार के वैभव व सुख से रहित, संकीर्ण मानसिक प्रवृत्ति का, शारीरिक रूप से भी अववस्थ व अक्षम, सदैव दुःखी रहने वाला परन्तु शत्रुनाशक तथा विवाहोपरान्त भाग्योदय अवश्य होता है। दूसरे मत में अर्थात् शुक्र के शुभ फल में जातक अत्यधिक सुख प्राप्ति, धनवान, अधिक शारीरिक सुख प्रापत करने वाला तथा समस्त प्रकार के वैभव को भोगने वाला होता है।
       ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि ऐसा जातक अपने मातृपक्ष (मामा-मौसी) के लिये अशुभ होता है। इस भाव में शुक्र यदि पृथ्वी तत्व (वृषभ, कन्या व मकर) राशि में हो तो जातक का जीवनसाथी सुन्दर तो होता है परन्तु झगड़ालू प्रवृत्ति का होता है। वह परिवार में सामंजस्य बनाकर चलता है। ऐसे लोगों को )ण से बचना चाहिये क्योंकि यदि उन्होंने एक बार )ण ले लिया तो फिर इस योग के प्रभाव से वह जीवनपर्यन्त )णग्रस्त रहेंगे। एक पुत्री को वैधव्य भोगना पड़ सकता है जिसका पूर्ण खर्चा जातक को ही उठाना पड़ता है। खाने में कोई संयम नहीं रखते हैं। गुप्त रोग के साथ मूत्र संस्थान का संक्रमण भी हो सकता है।
      आपको शत्रुओं से पीडा भी मिल सकती है। हांलाकि आप शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर पाएंगे। आपको भाई-बहनों और मामा से सुख मिलेगा। आपके मामा के कन्या संतान अधिक हो सकती हैं। आपके अच्छे मित्रों की संख्या कम होगी जबकि खराब आदतों वाले मित्र अधिक संख्या में होंगे। आपकी प्रथम संतान पुत्र के रूप में हो सकती है। आपकी संतान अच्छी होगी और आप पुत्र-पौत्रों से युक्त होंगे। किसी भी जन्म कुंडली के छठे भाव में शुक्र  जातक की कुंडली के छठे भाव में बैठा शुक्र जातक को विपरित लिंग की ओर आकर्षित करता है। 
     लग्न का छठा भाव बुध और केतू का माना गया है जो एक दूसरे के शत्रु हैं, लेकिन शुक्र दोनों का मित्र है. इस घर में शुक्र नीच होता है। लेकिन यदि जातक विपरीत लिंगी को प्रसन्न रखता है और सारे और सुविधा उपलब्ध करवाता है तो उसके धन और पैसे में बृद्धि होगी।  ऐसा जातक अपने काम को बिच में अधूरा नहीं छोड़ता है। इस भाव के शुक्र पर हुए मेरे शोध का फल कहता है कि ऐसा जातक संसार के प्रत्येक सुख का भोग करता है लेकिन इस भोग के कारण उसे गुप्त रोग भी होता (कर्क, वृश्चिक व मीन) राशि में हो तो जातक अत्यधिक यदि पुरुष राशि (मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु व कुंभ) में हो तो जीवनसाथी सुन्दर व सुशील होता है परन्तु वह कठोर भाषा का प्रयोग अधिक करता है। 
   जब स्त्री राशि (वृषभ, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर व मीन) में शुक्र होने पर जीवनसाथी बहुत ही कोमल शरीर का परन्तु स्वभाव बिलकुल विपरीत होता है। संतान कम होती है। पण्डित दयानन्द शास्त्री जी के अनुसार ऐसा जातक रुपया लगाकर व्यापार में पूर्णतः असफल होता है परन्तु बिना धन के व्यवसाय में सफल हो जाता है। उदाहरण के लिये जैसे किसी व्यवसाय में कोई ऐसा व्यक्ति धन लगाये जिसे व्यापार का अनुभव न हो तो ऐसे जातक को वह सलाहकार अथवा किसी अन्य रूप में सम्मिलित करे तो फिर जातक व्यापार में बहुत सफल होता है।
    ऐसा होने पर स्त्री पक्ष से आपको कम सुख मिलेगा अथवा कुछ गुप्त परेशानियां रह सकती हैं। हांलाकि विवाह के बाद यदि आपका आहार विहार नियमित और मर्यादित रहेगा तो समस्याएं नहीं होंगी। आपके खर्चे आमदनी से अधिक हो सकते हैं। हो सकता है कि आप उचित स्थान पर खर्च न करके अनुचित जगह पर खर्च करें। हो सकता है कि स्वतंत्र व्यवसाय से भी आपको बहुत लाभ न मिल पाए।
इन उपाय से होगा लाभ -
-- जातक की पत्नी को पुरुषों के जैसे कपडे नहीं पहनने चाहिए और न ही पुरुषों के जैसे बाल रखने चाहिए अन्यथा गरीबी बढती है। 
-- ऐसे जातक को उसी से विवाह करना चाहिए जिस स्त्री के भाई हों।
-- जातक स्त्री हो तो स्वयं या फिर पुरुष हो तो पत्नी अपने बालों में सोने का कि.ल लगाए। 
-- खयाल रखें कि पत्नी नंगे पैर न चले।

जाने और समझें श्री भैरव अष्टमी के महत्व और प्रभाव को

इस वर्ष भैरवाष्टमी 19 नवंबर 2019 (मंगलवार) को मनाई जाएगी। काल भैरव उत्तम तंत्र साधाना के लिए माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं में बताया गया है कि भगवान शंकर का ही भैरव बाबा अवतार हैं। भैरवाष्टमी के दिन व्रत एवं षोड्षोपचार पूजन करना अत्यंत शुभ एवं फलदायक माना जाता है। इस दिन श्री कालभैरव जी का दर्शन-पूजन शुभ फल देने वाला होता है। हमारे वैदिक ग्रंथों अनुसार श्री काल भैरव का जन्म मार्गशीर्ष मास के कृष्ण पक्ष अष्टमी को प्रदोष काल में हुआ था, तब से इसे भैरव अष्टमी के नाम से जाना जाता है। इसीलिए काल भैरव की पूजा मध्याह्न व्यापिनी अष्टमी पर करनी चाहिए।
Learn and understand the importance and impact of Shri Bhairav Ashtami-जाने और समझें श्री भैरव अष्टमी के महत्व और प्रभाव को    पौराणिक कथानुसार एक बार सृष्टिकर्ता भगवान ब्रह्मा ने भगवान भोलेनाथ की वेशभूषा और उनके गणों का उपहास उड़ाया, तब उस समय भगवान शिव के क्रोध से विशालकाय दंडधारी प्रचंडकाय काया प्रकट हुई और ब्रह्मा जी का वध करने के लिए बढ़ने लगी दौड़ी। पुराणों के अनुसार, इस काया ने ब्रह्मदेव के एक शीश को अपने नाखून से काट भी दिया। तभी भगवान शिव ने बीच बचाव करते हुए उसे शांत किया गया और फिर तब से ही ब्रह्मा जी के चार शीष ही बचे। ऐसी मान्यता है कि जिस दिन यह विशाल काया प्रकट हुई थी, वह दिन मार्गशीर्ष मास की कृष्णाष्टमी का दिन था। भगवान शिव के क्रोध से उत्पन्न इस काया का नाम भैरव पड़ा। भैरव का अर्थ है भय को हरने वाला या भय को जीतने वाला। इसलिए कालभैरव रूप की पूजा करने से मृत्यु और हर तरह के संकट का भय दूर हो जाता है। शिव पुराण के अनुसार शती काल भैरव भगवान शिव का रौद्र रूप है। ब्रह्मवैवर्त पुराण के उल्लेखानुसार कालभैरव श्रीकृष्ण के दाहिने नेत्र से प्रकट हुए थे, जो आठ भैरवों में से एक थे। कालभैरव रोग, भय, संकट और दुख के स्वामी माने गए हैं। इनकी पूजा से हर तरह की मानसिक और शारीरिक परेशानियां दूर हो जाती हैं।
पुराणों में बताए गए हैं 12 भैरव--- 
धर्म ग्रंथों में मिलते है | भक्तजन इनमें से किसी एक रूप की उपासना भैरव उपासक यदि सच्चे मन से कर लेते है | तो उन पर भैरव का प्रभाव पूरा -पूरा रहता है | अपने भक्तों के सारे संकट हरण करने के लिए वे स्वयं आते है |
ऐसे हैं श्री भैरव जी के सभी बारह स्वरुप (नाम)--
  • 1. बाल भैरव 
  • 2. बटुक भैरव 
  • 3. स्वर्णाकर्षण भैरव
  • भैरव जी के ये तीनों रूप सबसे सुंदर और मृदुल माने गए है | जिनमें स्वर्णाकर्षण भैरव को धन-धान्य के स्वामी और सृष्टि के पालन पोषण कर्ता के रूप पूजा जाता है | भैरव जी के ये तीनों स्वरुप पूर्णतः सात्विक माने गये है तथा भगवान विष्णु , राम , कृष्ण आदि के समान जी इन रूपों की पूजा की जाती है |
  • 4. महाकाल भैरव
  • भैरव जी के उपरोक्त तीनों स्वरुप के बिल्कुल विपरीत है –
  •  महाकाल भैरव | महाकाल भैरव को मृत्यु का देवता माना जाता है | यही काल रूप है | इस रूप को लेकर ही तंत्र साधना की जाती है | तांत्रिक सिद्धियाँ पाने के लिए भैरव जी को महाकाल भैरव के रूप में पूजा जाता है | इसलिए गृहस्थ जीवन में महाकाल भैरव की उपासना न करके बाल भैरव , बटुक भैरव और स्वर्णाकर्षण भैरव इन रूपों में पूजा की जानी चाहिए |
इनके अतिरिक्त भैरव जी के अन्य 8 रूप इस प्रकार से है ---
  • 5. असिताग भैरव
  • 6. रु रु भैरव 
  • 7. चंड भैरव
  • 8. क्रोधोन्मत भैरव
  • 9. भयंकर भैरव
  • 10. कपाली भैरव
  • 11. भीषण भैरव
  • 12. संहार भैरव
भैरव जी के ये सभी रूप सोम्य नहीं है बल्कि प्रचंड रूप है | भैरव जी को भगवान शिव का पाँचवा और रौद्र अवतार माना गया है | भैरव जी के सभी 12 रूपों में 9 रूपों को प्रचंड माना गया है | जिनकी उपासना तांत्रिक सिद्धियाँ पाने के लिए की जाती है | रविवार, बुधवार या भैरव अष्टमी पर इन 8 नामों का उच्चारण करने से मनचाहा वरदान मिलता है। भैरव देवता शीघ्र प्रसन्न होते हैं और हर तरह की सिद्धि प्रदान करते हैं। क्षेत्रपाल व दण्डपाणि के नाम से भी इन्हें जाना जाता है। 
  • इस वर्ष कालभैरव अष्टमी (जयन्ती) मंगलवार, नवम्बर 19, 2019 को मनाई जाएगी।
  • अष्टमी तिथि प्रारम्भ – नवम्बर 19, 2019 को03:35 पी एम बजे से आरम्भ होकर..
  • अष्टमी तिथि समाप्त – नवम्बर 20, 2019 को01:41 पी एम बजे होगी।

भगवान भैरव की महिमा अनेक शास्त्रों में मिलती है। भैरव जहां शिव के गण के रूप में जाने जाते हैं, वहीं वे दुर्गा के अनुचारी माने गए हैं। भैरव की सवारी कुत्ता है। चमेली फूल प्रिय होने के कारण उपासना में इसका विशेष महत्व है। साथ ही भैरव रात्रि के देवता माने जाते हैं और इनकी आराधना का खास समय भी मध्य रात्रि में 12 से 3 बजे का माना जाता है। भैरव के नाम जप मात्र से मनुष्य को कई रोगों से मुक्ति मिलती है। वे संतान को लंबी उम्र प्रदान करते है। अगर आप भूत-प्रेत बाधा, तांत्रिक क्रियाओं से परेशान है, तो आप शनिवार या मंगलवार कभी भी अपने घर में भैरव पाठ का वाचन कराने से समस्त कष्टों और परेशानियों से मुक्त हो सकते हैं।
    पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि यदि आप जन्मकुंडली में मंगल ग्रह के दोषों से परेशान हैं तो श्री भैरव की पूजा करके पत्रिका के दोषों का निवारण सरलता से कर सकते है। शनि या राहु से पीडि़त व्यक्ति अगर शनिवार और रविवार को काल भैरव के मंदिर में जाकर उनका दर्शन करें। तो उसके सारे कार्य सकुशल संपन्न हो जाते है। भैरव उपासना क्रूर ग्रहों के प्रभाव को समाप्त करती है. भैरव देव जी के राजस, तामस एवं सात्विक तीनों प्रकार के साधना तंत्र प्राप्त होते हैं। भैरव साधना स्तंभन, वशीकरण, उच्चाटन और सम्मोहन जैसी तांत्रिक क्रियाओं के दुष्प्रभाव को नष्ट करने के लिए कि जाती है। इनकी साधना करने से सभी प्रकार की तांत्रिक क्रियाओं के प्रभाव नष्ट हो जाते हैं।
   राहु केतु के उपायों के लिए भी इनका पूजन करना अच्छा माना जाता है। भैरव की पूजा में काली उड़द और उड़द से बने मिष्‍ठान्न इमरती, दही बड़े, दूध और मेवा का भोग लगाना लाभकारी है इससे भैरव प्रसन्न होते है भैरव की पूजा-अर्चना करने से परिवार में सुख-शांति, समृद्धि के साथ-साथ स्वास्थ्य की रक्षा भी होती है। तंत्र के ये जाने-माने महान देवता काशी के कोतवाल माने जाते हैं। भैरव तंत्रोक्त, बटुक भैरव कवच, काल भैरव स्तोत्र, बटुक भैरव ब्रह्म कवच आदि का नियमित पाठ करने से अपनी अनेक समस्याओं का निदान कर सकते हैं। भैरव कवच से असामायिक मृत्यु से बचा जा सकता है। ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी के अनुसार नारद पुराण में बताया गया है कि कालभैरव की पूजा करने से मनुष्‍य की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है। मनुष्‍य किसी रोग से लम्बे समय से पीड़‍ि‍त है तो वह रोग, तकलीफ और दुख भी दूर होती हैं। कालभैरव की पूजा पूरे देश में अलग-अलग नाम से और अलग तरह से की जाती है। कालभैरव भगवान शिव की प्रमुख गणों में एक हैं। सारे संकट भक्तों के भैरव बाबा की पूजा करने से खत्म होते हैं।  कहा जाता है कि बहुत मुश्किल भैरव साधना है। साथ ही सात्विकता और एकाग्रता का ध्यान भैरव बाबा की साधाना में करना होता है। पौराणिक कथाओं में कहा गया है कि भगवान शिव ने मार्गशीर्ष कृष्‍ण पक्ष अष्टमी के दिन अवतार लिया था। इस तिथि पर प्रत और पूजा इस उपलक्ष के तौर पर होती है। 
जानिए भैरव बाबा का महत्व 
हिंदू देवताओं में भैरव बाबा का बहुत महत्व माना गया है। शास्‍त्रों में कहा गया है कि भैरव बाब दिशाओं के रक्षक और काशी के संरक्षक हैं। भैरव बाबा के कई रूप में और बटुक भैरव और काल भैरव एक ही हैं। 
श्री भैरव जी के विभिन्न स्वरूप
शिवजी के रज, तम और सत्व गुणों के आधार पर श्री भैरव के स्वरूप कौन-कौन से हैं और किस मनोकामना के लिए कौन से स्वरूप की पूजा की जाती है...
  1. बटुक भैरव--यह भैरव का सात्विक और बाल स्वरूप है। जो लोग सभी सुख, लंबी आयु, निरोगी जीवन, पद, प्रतिष्ठा और मुक्ति पाना चाहते हैं, वे बटुक भैरव की पूजा कर सकते हैं।
  2. काल भैरव--यह भैरव का तामसिक स्वरूप है, लेकिन कल्याणकारी है। इस स्वरूप को काल का नियंत्रक माना गया है।इनकी पूजा अज्ञात भय, संकट, दुख और शत्रुओं से मुक्ति देने वाली मानी गई है।
  3. आनंद भैरव---यह भैरव का राजस यानी रज स्वरूप माना गया है। दस महाविद्या के अंतर्गत हर शक्ति के साथ भैरव की भी पूजा की जाती है। इनकी पूजा से धन, धर्म की सिद्धियां मिल सकती हैं।
जानिए भैरव अष्टमी के व्रत का महत्व 
शास्‍त्रों में कहा गया है कि शत्रुओं और नकारात्मक शक्तियों का नाश भैरवाष्टमी के दिन व्रत और पूजा-अर्चना करने से होता है। मान्यताओं के अनुसार,सभी तरह के पाप इस दिन भैरव बाबा की विशेष पूजा अर्चना करने से धूल जाते हैं। श्री कालभैरव जी के दर्शन और पूजा इस तिथि पर करने से शुभ फल मिलता है। 
जानिए भैरव जी की पूजा के लाभ
ऐसा कहा जाता है कि पूजा-अर्चना भैरव जी की इस दिन करने से सारी मनोकामना पूर्ण होती है। जो भक्त इस दिन भैरव बाबा की पूजा करते हैं वह निर्भय होते हैं साथ ही उनके सारे कष्ट भी दूर हो जाते हैं। भैरव बाबा की पूजा और व्रत इस दिन करने से सारे विघ्न खत्म हो जाते हैं। भूत, पिशाच एवं काल भी इनके भक्तों से दूर रहते हैं।
लाभदायक होती हरण भैरव की साधना 
ग्रहों के क्रूर प्रभाव भी भैरव बाबा की पूजा करने से खत्म होते हैं। इतना ही नहीं हर तरह की तांत्रिक क्रियाओं के प्रभाव भी भैरव बाबा की साधना से दूर होते हैं। 
ऐसे करें भैरव पूजन
षोड्षोपचार पूजन के साथ भैरव बाबा की पूजा करनी चाहिए। रात्र में जागरण करना चाहिए। भैरव कथा व आरती रात में भजन कीर्तन करते हुए करनी चाहिए ऐसा करके विशेष फल की प्राप्ति होती है। इस दिन काले कुत्ते को भोजन कराने से भैरव बाबा प्रसन्न होते हैं।

वृश्चिक राशि में देव गुरु वृहस्पति का प्रवेश, 5 महीनें रखें सावधानी

देवगुरु वृहस्पति लगभग 12 वर्षों बाद पुनः 05 नवंबर 2019 को प्रातः अपनी राशि धनु में प्रवेश कर रहे हैं। ये एक सदी में लगभग आठ बार धनु राशि की परिक्रमा करते हैं।  देव वृहस्पति ग्रह 5 नवंबर 2019, मंगलवार रात 12 बजकर 3 मिनट पर अपनी राशि धनु में गोचर करेगा और 29 मार्च 2020, रविवार शाम को 7 बजकर 8 मिनट तक इसी राशि में स्थित रहेगा। गुरु के धनु राशि में गोचर करने से 'हंस' योग बनता है। धनु और मीन राशि के स्वामी गुरु पुनर्वसु, विशाखा एवं पूर्वाभाद्रपद नक्षत्रों के भी स्वामी हैं। कर्क राशि इनकी उच्च और मकर राशि नीच संज्ञक कही गयी है। जिन जातकों की जन्मकुंडली में गुरु धनु राशि में होकर केन्द्र या त्रिकोण में होंगे उनके लिए 'हंस' योग श्रेष्ठतम फलदाई रहेगा।ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी बताते हैं कि वैदिक ज्योतिष में बृहस्पति को सर्वाधिक शुभ एवं शीघ्रफलदाई ग्रह माना गया है। जन्मकुंडली में द्वितीय, पंचम, नवम तथा एकादश भाव के कारक होते हैं।
गुरु बृहस्पति का कुंडली पर प्रभाव--
कुंडली में बृहस्पति की अनुकूल स्थिति व्यक्ति को मान सम्मान और ज्ञान प्रदान करती है तथा व्यक्ति को धन की प्राप्ति भी अच्छी मात्रा में होती है। संतान सुख की प्राप्ति के लिए भी बृहस्पति की मजबूत स्थिति को देखा जाता है। वहीं दूसरी ओर गुरु बृहस्पति जब इसके विपरीत अवस्था में होते हैं तो इन सभी कारकों में कमी आने की संभावना बढ़ जाती है। 
 Lord-Jupiter-in-Scorpio-keep-careful-for-5-months-वृश्चिक राशि में देव गुरु वृहस्पति का प्रवेश, 5 महीनें रखें सावधानी    मान-सम्मान, पद-प्रतिष्ठा, संयम, धैर्य, तरक्की, ज्ञान, सदाचरण और वैवाहिक सुख का प्रतिनिधि ग्रह बृहस्पति 5 नवंबर को सुबह अपनी राशि धनु में प्रवेश कर रहा है। वर्ष 2019 में बृहस्पति ने कई बार मार्गी-वक्री गति करते हुए आगे-पीछे की राशियों में गोचर किया। धनु राशि में चल रहे बृहस्पति 10 अप्रैल को वक्री हुए थे। वक्री गति करते हुए ये 22 अप्रैल को पिछली राशि वृश्चिक में आ गए थे। इसके बाद 11 अगस्त को वृश्चिक राशि में ही मार्गी हो गए थे। अब मार्गी गति करते हुए 5 नवंबर को पुन: अपनी ही राशि धनु में आ रहे हैं। बृहस्पति कर्क राशि में उच्च का होता है और मकर में नीच का। धनु और मीन इसकी स्वयं की राशि है। यह धनु और मीन राशि के स्वामी हैं और कर्क राशि में उच्च तथा मकर राशि में नीच अवस्था में माने जाते हैं। कुंडली में चंद्रमा लग्न पर बृहस्पति की दृष्टि अमृत समान मानी जाती है। यह स्थिति गजकेसरी योग बनाती हैं।

देव गुरु वृहस्पति ग्रह 5 नवंबर को कल धनु राशि में प्रवेश करेंगे जहाँ 30 मार्च 2020 तक  इसी राशि में रहने वाले हैं. वह 22 अप्रैल 2019 से वृश्चिक राशि में ही विराजमान थे. गुरु के राशि परिवर्तन का प्रभाव सभी राशियों के जातकों पर पड़ेगा। किसी राशि के जातक को धन का लाभ होगा तो किसी को स्वास्थ्य की परेशानी होगी। पांच राशि वालों के जीवन में बड़ा बदलाव आएगा। यह बात उज्जैन के प्रसिद्ध ज्योतिष पण्डित दयानन्द शास्त्री जी सभी राशि परिवर्तन से होने वाले असर के बारे में बताते हुए कही
जीवन में बदलाव लाएगा--
उज्जैन के प्रसिद्ध ज्योतिषी पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि भारतीय वैदिक ज्योतिष के अंतर्गत ग्रहों में बृहस्पति को देवताओं का गुरु कहा गया है और ग्रहों के मंत्रिमंडल में इन्हें मंत्री का पद प्राप्त है। ये नैसर्गिक रूप से सब से शुभ ग्रह माने जाते हैं। यह वृद्धि के कारक हैं इसलिए अच्छी या बुरी जो भी घटना हो उसमें इनका योग वृद्धि कारक होता है। यह हमारे जीवन में हमारे गुरु और गुरु तुल्य लोगों, हमारे परिवार के बड़े बुजुर्गों, संतान, धन तथा ज्ञान का कारक प्राप्त है। जन्म कुंडली में गुरु की स्थिति से जातक के जीवन के बारे में कई महत्वपूर्ण बातें पता चलती हैं। इसलिए यह राशि परिवर्तन कई तरह से जीवन में बदलाव लाएगा।
     गुरु एक राशि में करीब एक साल रहते हैं इसलिए 12 साल के बाद फिर से अपनी राशि धनु में लौटते हैं। 5 नवंबर को गुरु सुबह  अपनी राशि धनु में लौट रहे हैं। अपनी राशि धनु में गुरु अगले साल 2020 मार्च तक रहेंगे। इस राशि में गुरु का स्वागत दो पाप ग्रह केतु और शनि करेंगे। शनि और केतु से साथ गुरु का संयोग यूं तो शुभ नहीं है फिर भी गोचर के अनुसार कुछ राशियों को इसका परिवर्तन शुभ लाभ  होगा तो किसी को होगा नुकसान. ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी से जानते हैं कि अगले 5 महीने किन किन राशि वालों को सबसे अधिक सावधान रहने की आवश्यकता है।
  1. मेष राशि- मेष राशि से नवम भाव में गुरु का गोचर रुके हुए कार्यों को पूरा करने के साथ-साथ भाग्य में वृद्धि करेगा तथा मनचाहा परिणाम देगा. इस राशि के लिए बृहस्पति नवम भाव में गोचर करेगा। इस राशि वालों को अपने कर्मों के अनुसार फल प्राप्त होता। इस राशि के लिए बृहस्पति भाग्योदकारी है। नौकरी में प्रमोशन, व्यापार में लाभ मिलेगा। पारिवारिक जीवन अच्छा रहेगा। घर में नए मेहमान आएंगे। आर्थिक मामलों के लिए वक्त शुभ रहेगा। आपको कई स्रोतों से धन की प्राप्ति हो सकती है। धार्मिक कार्यों में रुचि होगी। धार्मिक यात्राओं पर जा सकते हैं। तीर्थयात्रा हो सकती है. सत्संग का लाभ मिलेगा. पार्टी व पिकनिक का कार्यक्रम बन सकता है. स्वादिष्ट भोजन का आनंद प्राप्त होगा. रचनात्मक कार्य सफल रहेंगे. पठन-पाठन व लेखन के काम में मन लगेगा. धन प्राप्ति सुगम होगी. पारिवारिक सुख-शांति बनी रहेगी. जल्दबाजी न करें.
  2. वृषभ राशि- इस राशि के लिए बृहस्पति का गोचर अष्टम भाव में होगा। इससे कुछ परेशानी का सामना करना पड़ सकता है। सेहत का विशेष ध्यान रखना होगा। पेट संबंधी रोग आ सकते हैं। अनचाही यात्राएं होंगी। आर्थिक पक्ष कमजोर रहेगा। धन संचय करने में परेशानी आ सकती है। उधार चुकाने का दबाव रहेगा। व्यापार में मनचाहे परिणाम प्राप्त करने के लिए कड़ी मेहनत करना पड़ेगी। धार्मिक कार्यों की ओर रूझान बढ़ेगा। रोजगार में वृद्धि होगी. प्रतिद्वंद्वी सक्रिय रहेंगे. शारीरिक कष्ट की वजह से बाधा संभव है. उन्नति के मार्ग प्रशस्त होंगे. आय में वृद्धि होगी. वरिष्ठ जनों का सहयोग तथा मार्गदर्शन प्राप्त होगा. पार्टनरों से मतभेद दूर होंगे. कुसंगति से हानि होगी. विवेक से कार्य करें।
  3. मिथुन राशि- इस राशि के लिए बृहस्पति का गोचर सप्तम स्थान में रहेगा। इस समय आपका वैवाहिक जीवन सुखद रहेगा। वैवाहिक जीवन में चल रहे मतभेद दूर होंगे। आर्थिक स्थिति के लिए समय उत्तम है। पार्टनरशिप में कोई नया कार्य प्रारंभ करना चाहते हैं तो अवश्य करें लाभ होगा। प्रेम संबंधों में नयापन आएगा। नौकरी में तरक्की, बिजनेस में लाभ की स्थिति मिलेगी। समाज में सम्मान प्राप्त होगा। अप्रत्याशित खर्च सामने आएंगे. किसी व्यक्ति के व्यवहार से मन खिन्न रहेगा. पुराना रोग उभर सकता है. दूर का समाचार मिल सकता है. चिंता तथा तनाव में वृद्धि होगी. पार्टनरों तथा मातहतों से मतभेद बढ़ सकते हैं. दूसरों से अपेक्षा न करें. आय में निश्चितता रहेगी.
  4. कर्क राशि- इस राशि के लिए बृहस्पति छठे भाव में गोचर करेगा। कर्क राशि में बृहस्पति उच्च का होता है। इसलिए इसका शुभ प्रभाव मिलने वाला है। इस राशि के जो लोग शत्रुओं से परेशान हैं, उनकी यह परेशानी शीघ्र दूर होगी। रोगों से मुक्ति मिलने का समय है। हालांकि मानसिक रूप से मजबूत रहना होगा कोई अनपेक्षित घटना हो सकती है। वैवाहिक जीवन के लिए समय ठीक है। आर्थिक स्थिति में मजबूती आएगी। थोड़े प्रयास से ही कार्य बनेंगे. सामाजिक प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी. सामाजिक कार्य करने का अवसर मिलेगा. धन प्राप्ति सुगम होगी. संतान पक्ष से कोई खराब सूचना मिल सकती है. चिंता तथा तनाव रहेंगे. प्रतिद्वंद्वी शांत रहेंगे. विवाद से स्वाभिमान को ठेस पहुंच सकती है. जोखिम न लें.
  5. सिंह राशि- इस राशि के लिए बृहस्पति पंचम स्थान में गोचर करने जा रहा है। अपने मित्र सूर्य की राशि में मार्गी गुरु का प्रवेश इसके लिए शुभ रहेगा। इस राशि के जातकों की पारिवारिक स्थिति सुखद रहेगी। आर्थिक पक्ष मजबूत होगा। कर्ज मुक्ति की स्थिति बन रही है। संतान पक्ष की चिंता दूर होगी। संतानों के विवाह की बात बनेगी। नौकरीपेशा को सम्मान, व्यापारियों को कार्य विस्तार का सुख प्राप्त होगा। परिवार में अतिथियों का आगमन होगा. शुभ समाचार प्राप्त होंगे. आत्मविश्वास में वृद्धि होगी. कोई नया काम करने की योजना बन सकती है. व्यवसाय ठीक चलेगा. थकान महसूस होगी. आलस्य हावी रहेगा. बेचैनी रहेगी. पारिवारिक सहयोग प्राप्त होगा. मतभेद कम होंगे. जल्दबाजी न करें।
  6. कन्या राशि- इस राशि के लिए गुरु का गोचर चतुर्थ स्थान में होगा। चतुर्थ स्थान सुख स्थान होता है, इसलिए यहां पर बृहस्पति का मार्गी होना इस राशि वालों को अनेक प्रकार के सुख प्रदान करेगा। पारिवारिक जीवन में मधुरता तो आएगी ही, जो लोग वैवाहिक सुख की प्रतीक्षा कर रहे हैं उनकी इच्छा पूरी होने वाली है। भौतिक सुख-सुविधाओं में वृद्धि होगी। स्वयं पर खर्च करेंगे। पर्यटन का अवसर आएगा। दोस्तों के साथ मेल मुलाकात होगी। भाग्योन्नति के प्रयास सफल रहेंगे. यात्रा मनोरंजक रहेगी. सुखमय जीवन व्यतीत होगा. किसी बड़ी समस्या का हल मिलेगा. प्रसन्नता रहेगी. धन प्र‍ाप्ति सुगम होगी. वरिष्ठजनों का सहयोग तथा मार्गदर्शन प्राप्त होगा. अप्रत्याशित लाभ हो सकता है. ऐश्वर्य के साधनों पर बड़ा खर्च होगा.
  7. तुला राशि- इस राशि के लिए गुरु मार्गी तृतीय स्थान में होगा। भाई-बंधुओं के साथ रिश्ते सुधरेंगे। पैतृक संपत्ति को लेकर चल रहे विवाद सुलझने की स्थिति में आ जाएंगे। अभी तक आपकी जो योजनाएं आगे नहीं बढ़ पा रही थीं, उन्हें गति मिलेगी। सम्मान और सुख प्राप्त होगा। सेहत के लिहाज से यह गोचर ठीक नहीं रहेगा। मस्तिष्क संबंधी रोग उभर सकते हैं। पेट के निचले हिस्से के रोग भी परेशान करेंगे। संतान पक्ष की चिंता रहेगी। मशीनरी से चोट लग सकती है। इस राशि के जातकों को वैवाहिक प्रस्ताव मिल सकता है. अप्रत्याशित खर्च सामने आएंगे. बनते कामों में विघ्न आ सकते हैं. कर्ज लेना पड़ सकता है. स्वास्थ्य कमजोर रहेगा. काम में मन नहीं लगेगा. पार्टनरों से मतभेद हो सकता है. जोखिम व जमानत के कार्य टालें. कीमती वस्तुएं संभालकर रखें. विवाद न करें.
  8. वृश्चिक राशि- इस राशि के लिए बृहस्पति का गोचर द्वितीय स्थान में हो रहा है। धन स्थान में बृहस्पति का बैठना शुभ संकेत है। आपकी आर्थिक योजनाओं को गति मिलेगी। नया कार्य व्यवसाय प्रारंभ करना चाहते हैं या पुराने को विस्तार देना चाहते हैं तो समय अच्छा है। इस दौरान किसी बड़े प्रोजेक्ट के पूरे हो जाने से मानसिक सुख-श्ाांति प्राप्त होगी। वैवाहिक जीवन में मधुरता आएगी। प्रेम संबंध में अनुकूलता प्राप्त होगी, लेकिन पार्टनर के साथ पारदर्शी व्यवहार करना होगा। कानूनी अड़चन आ सकती है. वाणी पर नियंत्रण रखें. बकाया वसूली के प्रयास सफल रहेंगे. शारीरिक कष्ट संभव है. बेचैनी रहेगी. मनोरंजक यात्रा होगी. धनलाभ के अवसर हाथ आएंगे. लेन-देन में जल्दबाजी न करें. भाइयों से सहयोग मिलेगा. घर में सुख-शांति बनी रहेगी.
  9. धनु राशि- इसी राशि में बृहस्पति आ रहा है और यह लग्न यानी प्रथम स्थान है। यहां पर बृहस्पति के मार्गी होने से शारीरिक दिक्कतें दूर होंगी। सुख-सौभाग्य प्राप्त होगा। धन की तंगी दूर होने की स्थिति बनेगी और आय के एक से अधिक साधन प्राप्त होंगे। सेहत के लिहाज से यह गोचर अच्छा साबित होगा। बीमारियों पर हो रहे खर्च में कमी आएगी। जीवनसाथी के साथ पर्यटन का मौका आएगा। शत्रुओं को परास्त करने में कामयाब होंगे। सभी कार्य आपके मनोनुकूल होंगे। मानसिक द्वंद्व रहेगा. चोट व रोग से बचें. अपरिचितों पर विश्वास न करें. जल्दबाजी न करें. नई योजना बनेगी. नए कार्य प्रारंभ करने का मन बनेगा. व्यवसाय में अनुकूलता रहेगी. मित्रों के साथ अच्‍छा समय गुजरेगा. प्रसन्नता रहेगी. मनोरंजन के अवसर मिलेंगे. भाग्य का साथ मिलेगा.
  10. मकर राशि- इस राशि के लिए द्वादश स्थान में मार्गी बृहस्पति का आना मिलाजुला प्रभाव दिखाएगा। चूंकि द्वादश स्थान व्यय भाव होता है इसलिए खर्च में निश्चित तौर पर बढ़ोतरी होगी, लेकिन ध्यान रखना होगा कि यह खर्च कहां हो रहा है। अनावश्यक कार्यों पर खर्च करने से खुद को रोकना होगा। आय के साधनों में वृद्धि होगी। कोई ऐसा कार्य प्राप्त होने के योग बन रहे हैं जो आपके धन भंडार में वृद्धि करेगा। पारिवारिक जीवन सुखद रहेगा। सेहत बेहतर रहेगी। तीर्थ दर्शन हो सकता है. सत्संग का लाभ मिलेगा. प्रभावशाली व्यक्तियों से मेलजोल बढ़ेगा. कार्य की बाधा दूर होगी. व्यापार-व्यवसाय मनोनुकूल रहेगा. पारिवारिक सहयोग मिलेगा. कुछ तनाव भी हो सकता है. थकान हो सकती है. परिस्थिति अनुकूल रहेगी. जल्दबाजी न करें.
  11. कुंभ राशि- कुंभ राशि के लिए एकादश भाव में मार्गी बृहस्पति के आने से स्थितियों में सुधार आएगा। अब तक जो भागदौड़ और जीवन में अनिश्चितता बनी हुई थी वह दूर हो जाएगी। अपने बारे में कोई अच्छा निर्णय ले पाएंगे। हालांकि अभी भी कोई बड़ा निवेश करने से बचना होगा। खासकर वाहन, मशीनरी के कार्यों में निवेश करें। मान-सम्मान, पद-प्रतिष्ठा में अवश्य वृद्धि होगी। अविवाहितों को विवाह सुख की प्राप्ति होगी।प्रेम-प्रसंग में अनुकूलता रहेगी. कामकाज मनमाफिक चलेगा. प्रसन्नता रहेगी. प्रभावशाली व्यक्तियों का सहयोग मिलेगा. जल्दबाजी से का‍म बिगड़ सकते हैं. पारिवारिक संबंधों में प्रगाढ़ता आएगी. सुख-शांति बनी रहेगी. वाणी में हल्के शब्दों के प्रयोग से बचें. सुख के साधनों पर खर्च होगा.
  12. मीन राशि- यह राशि चक्र की अंतिम राशि हैं। मीन राशि के लिए मार्गी बृहस्पति का गोचर दशम स्थान में होगा। कार्य स्थान में बृहस्पति का शुभ प्रभाव मिलेगा। जिनके पास नौकरी नहीं है उन्हें नौकरी मिलेगी। बिजनेस प्रारंभ करने के लिए सही वक्त है, कार्य विस्तार करें। प्रॉपर्टी और वाहन में निवेश फलेगा। सेहत में सुधार आएगा। परिवार के बुजुर्गों के सहयोग से सही निर्णय ले पाएंगे। मित्रों, भाई-बंधुओं के साथ संबंधों में सुधार आएगा। पारिवारिक समागम का अवसर आएगा।कष्ट, भय, तनाव व चिंता का वातावरण बन सकता है. जोखिम व जमानत के कार्य टालें. वाहन व मशीनरी के प्रयोग में विशेष सावधानी रखें. दूसरों के झगड़ों में न पड़ें. कीमती वस्तुएं गुम हो सकती हैं. आय में निश्चितता रहेगी. व्यवसाय ठीक चलेगा. नौकरी में सह‍कर्मियों से विवाद संभव है।
बृहस्पति ग्रह की शांति के कुछ उपाय ---
ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि ज्योतिष शास्त्र के अनुसार अगर आपकी कुंडली में बृहस्पति अनुकूल अवस्था में नहीं है तो आपको पुखराज रत्न धारण करना चाहिए।
- बृहस्पति धनु और मीन राशियों के स्वामी हैं इसलिए अगर इन दोनों राशियों के जातक पुखराज धारण करें तो उन्हें शुभ फल मिलते हैं। इसके साथ ही बृहस्पति ग्रह के अच्छे फल प्राप्त करने के लिए गुरुवार के दिन या बृहस्पति की होरा में गुरु यंत्र को अपने घर में स्थापित करना चाहिए। आप गुरु ग्रह के शुभ परिणाम प्राप्त करने के लिए पीपल की जड़ को गुरु की होरा या गुरु के नक्षत्रों में भी धारण कर सकते हैं।

जानिए क्या हैं श्रीयंत्र, श्रीयंत्र का महत्व एवम श्री यंत्र निर्माण एवम सिद्ध करने का तरीका

ऐसा होता हैं श्रीयंत्र का स्वरूप--
श्रीयंत्र अपने आप में रहस्यपूर्ण है। यह सात त्रिकोणों से निर्मित है। मध्य बिन्दु-त्रिकोण के चतुर्दिक् अष्ट कोण हैं। उसके बाद दस कोण तथा सबसे ऊपर चतुर्दश कोण से यह श्रीयंत्र निर्मित होता है। यंत्र ज्ञान में इसके बारे में स्पष्ट किया गया है-
चतुर्भिः शिवचक्रे शक्ति चके्र पंचाभिः।
नवचक्रे संसिद्धं श्रीचक्रं शिवयोर्वपुः॥

श्रीयंत्र के चतुर्दिक् तीन परिधियां खींची जाती हैं। ये अपने आप में तीन शक्तियों की प्रतीक हैं। इसके नीचे षोडश पद्मदल होते हैं तथा इन षोडश पद्मदल के भीतर अष्टदल का निर्माण होता है, जो कि अष्ट लक्ष्मी का परिचायक है। अष्टदल के भीतर चतुर्दश त्रिकोण निर्मित होते हैं, जो चतुर्दश शक्तियों के परिचायक हैं तथा इसके भीतर दस त्रिकोण स्पष्ट देखे जा सकते हैं, जो दस सम्पदा के प्रतीक हैं। दस त्रिकोण के भीतर अष्ट त्रिकोण निर्मित होते हैं, जो अष्ट देवियों के सूचक कहे गए हैं। इसके भीतर त्रिकोण होता है, जो लक्ष्मी का त्रिकोण माना जाता है। इस लक्ष्मी के त्रिकोण के भीतर एक बिन्दु निर्मित होता है, जो भगवती का सूचक है। साधक को इस बिन्दु पर स्वर्ण सिंहासनारूढ़ भगवती लक्ष्मी की कल्पना करनी चाहिए।
इस प्रकार से श्रीयंत्र 2816 शक्तियों अथवा देवियों का सूचक है और श्री यंत्र की पूजा इन सारी शक्तियों की समग्र पूजा है।श्री यंत्र का रूप ज्योमितीय होता है। इसकी संरचना में बिंदु, त्रिकोण या त्रिभुज, वृत्त, अष्टकमल का प्रयोग होता है। तंत्र के अनुसार श्री यंत्र का निर्माण दो प्रकार से किया जाता है- एक अंदर के बिंदु से शुरू कर बाहर की ओर जो सृष्टि-क्रिया निर्माण कहलाता है और दूसरा बाहर के वृत्त से शुरू कर अंदर की ओर जो संहार-क्रिया निर्माण कहलाता है।
अद्भुत त्रिकोण----
चमत्कारी साधनाओं में श्रीयंत्र का स्थान सर्वोपरि है तथा मंत्र और तंत्र इसके साधक तत्व माने गए हैं। श्रीयंत्र सब सिद्धियों का द्वार है तथा लक्ष्मी का आवास है जिसमें अपने-अपने स्थान, दिशा, मंडल, कोण आदि के अधिपति व्यवस्थित रूप से आवाहित होकर विराजमान रहते हैं। मध्य में उच्च सिंहासन पर प्रधान देवता प्राण प्रतिष्ठित होकर पूजा प्राप्त करते हैं। श्रीयंत्र के दर्शन मात्र से साधक मनोरथ को पा लेता है।
    शास्त्रकारों ने इस बात पर बल दिया है कि जिस प्रकार शरीर और आत्मा में कोई भेद नहीं होता है उसी प्रकार श्रीयंत्र और लक्ष्मी में कोई भेद नहीं होता है। भारतीय तंत्र विधा का आधार अध्यात्म है। इस विधा की प्राचीनता ऋग्वेद से पहचानी जा सकती है। वैदिक जीवन चर्या में पूजन, यज्ञ तथा तंत्र में साधना का अपना विशेष स्थान था। पूजन पद्धतियों का उपयोग जीवन को शांत, उन्नातिशील, ऐश्वर्यवान बनाने के लिए होता था। 
   भौतिक जीवन में खुशहाली लाने के निमित्त श्रीयंत्र का निर्माण हुआ। श्रीयंत्र दरिद्रता रूपी स्थितियों को समाप्त करता है। ऋण भार से दबे साधकों के लिए यह रामबाण है। पूर्व जन्म के दुष्कर्मानुसार ही व्यक्ति की कुंडली में केमद्रुम योग, काक योग, दरिद्र योग, शकट योग, ऋण योग, दुयोग एवं ऋणग्रस्त योग आदि अशुभ योग मनुष्य को ऐश्वर्यहीन बनाते हैं। इन कुयोगों को दूर कर व्यक्ति को धन-ऐश्वर्य देने वाले यंत्रराज श्रीयंत्र की बड़ी महत्ता है। जिस प्रकार यंत्र एवं देवता में कोई भेद नहीं होता है। यंत्र देवता का निवास स्थान माना गया है। यंत्र और मंत्र मिलकर शीघ्र फलदायी होते हैं। श्रीयंत्र में लक्ष्मी का निवास रहता है। यह धन की अधिष्ठात्री देवी त्रिपुर-सुंदरी का यंत्र है। इसे षोडशी यंत्र भी कहा जाता है। 
जानिए क्या हैं श्रीयंत्र, श्रीयंत्र का महत्व एवम श्री यंत्र निर्माण एवम सिद्ध करने का तरीकाKnow-what-is-Shriyantra-importance-of-Sriyantra-and-how-to-prove-and-build-Shri-Yantraश्रीयंत्र बिंदु, त्रिकोण, वसुकोण, दशार-युग्म, चतुर्दशार, अष्ट दल, षोडसार, तीन वृत तथा भूपुर से निर्मित है। इसमें 4 ऊपर मुख वाले शिव त्रिकोण, 5 नीचे मुख वाले शक्ति त्रिकोण होते हैं। इस तरह त्रिकोण, अष्टकोण, 2 दशार, 5 शक्ति तथा बिंदु, अष्ट कमल, षोडश दल कमल तथा चतुरस्त्र हैं। ये आपस में एक-दूसरे से मिले हुए हैं। यह यंत्र मनुष्य को अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष देने वाला है।  श्री यंत्र में 9 त्रिकोण या त्रिभुज होते हैं जो निराकार शिव की 9 मूल प्रकृतियों के द्योतक हैं। मुख्यतः दो प्रकार के श्रीयंत्र बनाए जाते हैं – सृष्टि क्रम और संहार क्रम। सृष्टि क्रम के अनुसार बने श्रीयंत्र में 5 ऊध्वर्मुखी त्रिकोण होते हैं जिन्हें शिव त्रिकोण कहते हैं। ये 5 ज्ञानेंद्रियों के प्रतीक हैं। 4 अधोमुखी त्रिकोण होते हैं जिन्हें शक्ति त्रिकोण कहा जाता है। ये प्राण, मज्जा, शुक्र व जीवन के द्योतक हैं। संहार क्रम के अनुसार बने श्रीयंत्र में 4 ऊर्ध्वमुखी त्रिकोण शिव त्रिकोण होते हैं और 4 अधोमुखी त्रिकोण शक्ति त्रिकोण होते हैं।
    श्री यंत्र में 4 त्रिभुजों का निर्माण इस प्रकार से किया जाता है कि उनसे मिलकर 43 छोटे त्रिभुज बन जाते हैं जो 43 देवताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। मध्य के सबसे छोटे त्रिभुज के बीच एक बिंदु होता है जो समाधि का सूचक है अर्थात यह शिव व शक्ति का संयुक्त रूप है। इसके चारों ओर जो 43 त्रिकोण बनते हैं वे योग मार्ग के अनुसार यम 10, नियम 10, आसन 8, प्रत्याहार 5, धारणा 5, प्राणायाम 3, ध्यान 2 के स्वरूप हैं।
प्रत्येक त्रिकोण एवं कमल दल का महत्व---
इन त्रिभुजों के बाहर की तरफ 8 कमल दल का समूह होता है जिसके चारों ओर 16 दल वाला कमल समूह होता है। इन सबके बाहर भूपुर है। मनुष्य शरीर की भांति ही श्री यंत्र की संरचना में भी 9 चक्र होते हैं जिनका क्रम अंदर से बाहर की ओर इस प्रकार है- केंद्रस्थ बिंदु फिर त्रिकोण जो सर्वसिद्धिप्रद कहलाता है। फिर 8 त्रिकोण सर्वरक्षाकारी हैं। उसके बाहर के 10 त्रिकोण सर्व रोगनाशक हैं। फिर 10 त्रिकोण सर्वार्थ सिद्धि के प्रतीक हैं। उसके बाहर 14 त्रिकोण सौभाग्यदायक हैं। फिर 8 कमलदल का समूह दुःख, क्षोभ आदि के निवारण का प्रतीक है। उसके बाहर 16 कमलदल का समूह इच्छापूर्ति कारक है। अंत में सबसे बाहर वाला भाग त्रैलोक्य मोहन के नाम से जाना जाता है। इन 9 चक्रों की अधिष्ठात्री 9 देवियों के नाम इस प्रकार हैं – 1. त्रिपुरा 2. त्रिपुरेशी 3. त्रिपुरसुंदरी 4. त्रिपुरवासिनी, 5. त्रिपुरात्रि, 6. त्रिपुरामालिनी, 7. त्रिपुरसिद्धा, 8. त्रिपुरांबा और 9. महात्रिपुरसुंदरी।
श्रीयंत्र निर्माण--
श्रीयंत्र कई प्रकार से निर्मित तथा कई रूपों में उपलब्ध होता है। विभिन्न प्रकार से अंकित श्रीयंत्रों का प्रभाव भी अलग-अलग तरह का होता है। सबसे विशेष बात यह है कि ताम्र पत्र पर अंकित और पारद निर्मित प्राण प्रतिष्ठित श्रीयंत्र ही सबसे अधिक प्रभावकारी होते हैं।
     श्रीयंत्र का निर्माण और उसकी प्राण प्रतिष्ठा ही श्रीयंत्र के प्रभावशाली होने का सबसे बड़ा स्रोत है। वैसे तो आजकल सभी जगह श्रीयंत्र उपलब्ध है परन्तु उनकी विश्वसनियता नहीं है। श्रीयंत्र निर्माण अपने आप में जटिल प्रक्रिया है, और जब तक सही रूप में यंत्र उत्कीर्ण नहीं होता, तब तक उससे सफलता भी संभव नहीं। मंत्र सिद्ध प्राण प्रतिष्ठित श्रीयंत्र के स्थापन से साधक शीघ्र लाभ प्राप्ति की स्थिति को प्राप्त करता है। श्रीयंत्र चाहे ताम्र पत्र पर उत्कीर्ण हो, चाहे पारद निर्मित श्रीयंत्र हो उसके प्राण प्रतिष्ठित होने पर ही उसका लाभ प्राप्त किया जा सकता है।
श्रीयंत्र निर्माण की जटिल प्रक्रिया से यह तो स्पष्ट हो ही जाता है कि आप जब भी घर में श्रीयंत्र स्थापित करें तो प्राण प्रतिष्ठित श्रीयंत्र ही स्थापित करें।
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जानिए कब करें श्रीयंत्र की स्थापना ---
श्री यंत्र का निर्माण सिद्ध मुहूर्त में ही किया जाता है। गुरुपुष्य योग, रविपुष्य योग, नवरात्रि, धन-त्रयोदशी, दीपावली, शिवरात्रि, अक्षय तृतीया आदि श्रीयंत्र निर्माण और स्थापन के श्रेष्ठ मुहूर्त हैं। अपने घर में किसी भी श्रेष्ठ मुहूर्त में श्रीयंत्र को स्थापित किया जा सकता है। ‘ तंत्र समुच्चय’ के अनुसार किसी भी बुधवार को प्रातः श्रीयंत्र को स्थापित किया जा सकता है। इसकी स्थापना का विधान बहुत ही सरल है, शास्त्रों में इसके स्थापन का जो विधान है, वह आगे स्पष्ट किया जा रहा है।
      शास्त्रों के अनुसार मंत्र सिद्ध चैतन्य श्रीयंत्र की नित्य पूजा आवश्यक नहीं है और न ही नित्य जल से स्नान आदि कराने की जरूरत है। यदि संभव हो, तो इस पर पुष्प, इत्र आदि समर्पित किया जा सकता है और नित्य इसके सामने अगरबत्ती व दीपक जला देना चाहिए, परन्तु यह अनिवार्य नहीं है। यदि किसी दिन श्रीयंत्र की पूजा नहीं भी होती या इसके सामने अगरबत्ती व दीपक नहीं भी जलाया जाता, तब भी इसके प्रभाव में कोई न्यूनता नहीं आती। शुभ अवसरों पर श्री यंत्र की पूजा का विधान है। अक्षय तृतीया, नवरात्रि, धन-त्रयोदशी, दीपावली, आंवला नवमी आदि श्रेष्ठ दिवसों पर श्रीयंत्र की पूजा का विधान है।
सुविख्यात 'श्रीयंत्र' भगवती त्रिपुर सुंदरी का यंत्र है। इसे यंत्रराज के नाम से जाना जाता है। श्रीयंत्र में देवी लक्ष्मी का वास माना जाता है। यह संपूर्ण ब्रह्मांड की उत्पत्ति तथा विकास का प्रतीक होने के साथ मानव शरीर का भी द्योतक है। श्रीयंत्र में स्वतः कई सिद्धियों का वास है। उचित प्रभाव के लिए मंत्र सिद्ध, प्राण प्रतिष्ठायुक्त श्रीयंत्र स्थापित करना या करवाना चाहिए। बिना प्राण प्रतिष्ठायुक्त श्रीयंत्र को ऐसे समझें जैसे खाली मकान।  श्रीयंत्र के सम्मुख प्रतिदिन सामान्य रूप से धूप/ अगरबत्ती तथा घी का दीपक जलाने से लक्ष्मी की सामान्य पूजा होती है। श्रीयंत्र की पूजा से मनोकामना पूर्ति में कोई शंका नहीं रहती। साधक अपनी श्रद्धानुसार लक्ष्मी की पूजा-अर्चना करे तो लक्ष्मी उस पर प्रसन्ना होकर अभीष्ट लाभ प्रदान कर उसे संतुष्ट करेगी। 
गले की चेन या लॉकेट में पहने गए यंत्र ज्यादा प्रभावशाली रहते हैं। क्योंकि उनमें पवित्रता स्थायी रूप से बनी रहती है। भोजपत्र पर अष्टगंध से श्रीयंत्र बनाकर यदि बटुए में रखा जाए तो बटुआ रुपयों से भरा रहता है। धन की बरकत होती है। 
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यह हैं श्रीयंत्र स्थापना हेतु पूजन विधान---
इस यंत्र को पूजा स्थान के अलावा अपनी अलमारी में भी रखा जा सकता है, फैक्टरी या कारखाने अथवा किसी महत्वपूर्ण स्थान पर भी स्थापित किया जा सकता है। जिस दिन से यह स्थापित होता है, उसी दिन से साधक को इसका प्रभाव अनुभव होने लगता है। श्रीयंत्र का पूजन विधान बहुत ही सरल और स्पष्ट है। स्नान, ध्यान शुद्ध पीले रंग के वस्त्र धारण कर, पूर्व या उत्तर की ओर मुंह कर पीले या सफेद आसन पर बैठ जाएं। अपने सामने एक बाजोट स्थापित कर उस पर लाल वस्त्र बिछा लें। गृहस्थ व्यक्तियों को श्रीयंत्र का पूजन पत्नी सहित करना सिद्धि प्रदायक बताया गया है। आप स्वयं अथवा पत्नी सहित जब श्रीयंत्र का पूजन सम्पन्न करें तो पूर्ण श्रद्धा एवं विश्वास के साथ ही पूजन सम्पन्न करें।
साधना में सफलता हेतु गुरु पूजन आवश्यक है। अपने सामने स्थापित बाजोट पर गुरु चित्र/विग्रह/यंत्र/पादुका स्थापित कर लें और हाथ जोड़कर गुरु का ध्यान करें –
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् पर ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

इसके पश्चात् चावलों की ढेरी बनाकर उस पर एक सुपारी गणपति स्वरूप स्थापित कर लें। गणपति का पंचोपचार पूजन कुंकुम, अक्षत, चावल, पुष्प, इत्यादि से करें। बाजोट या पटिये पर एक ताम्रपात्र में पुष्पों का आसन देकर श्रीयंत्र (ताम्र/पारद या जिस स्वरूप में हो) स्थापित कर लें।इसके बाद एकाग्रता पूर्वक श्री यंत्र का ध्यान करें –
दिव्या परां सुधवलारुण चक्रयातां
मूलादिबिन्दु परिपूर्ण कलात्मकायाम।
स्थित्यात्मिका शरधनुः सुणिपासहस्ता
श्री चक्रतां परिणतां सततां नमामि॥

श्री यंत्र ध्यान के पश्चात् श्रीयंत्र प्रार्थना करनी चाहिए। यदि नित्य इस प्रार्थना का 108 बार उच्चारण किया जाए, तो अपने आप में अत्यन्त लाभप्रद देखा गया है –
धनं धान्यं धरां हर्म्यं कीर्तिर्मायुर्यशः श्रियम्।
तुरगान् दन्तिनः पुत्रान् महालक्ष्मीं प्रयच्छ मे॥

ध्यान-प्रार्थना के पश्चात् श्रीयंत्र पर पुष्प अर्पित करते हुए निम्न मंत्रों का उच्चारण करें –
ॐ मण्डूकाय नमः। ॐ कालाग्निरुद्राय नमः। ॐ मूलप्रकृत्यै नमः। ॐ आधारशक्तयै नमः। ॐ कूर्माय नमः। ॐ शेषाय नमः। ॐ वाराहाय नमः। ॐ पृथिव्यै नमः। ॐ सुधाम्बुधये नमः। ॐ रत्नद्वीपाय नमः। ॐ भैरवे नमः। ॐ नन्दनवनाय नमः। ॐ कल्पवृक्षाय नमः। ॐ विचित्रानन्दभूम्यै नमः। ॐ रत्नमन्दिराय नमः। ॐ रत्नवेदिकायै नमः। ॐ धर्मवारणाय नमः। ॐ रत्न सिंहासनाय नमः।

कमलगट्टे की माला से लक्ष्मी बीज मंत्र की एक माला मंत्र जप करें।
लक्ष्मी बीज मंत्र----

ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः॥

सबसे प्रभावपूर्ण एवं सर्वाधिक लाभप्रद लक्ष्मी बीज मंत्र है, जिसका प्रयोग मैंने अपने जीवन में किया है और जिन व्यक्तियों को भी मैंने इस बीज मंत्र के बारे में बताया है, उन्हें भी यह लक्ष्मी बीज मंत्र विशेष अनुकूल रहा है। लक्ष्मी से सम्बन्धित ग्रंथों के अनुसार यदि मंत्रसिद्ध श्रीयंत्र के सामने ‘ कमलगट्टे की माला ’ से नित्य लक्ष्मी बीज मंत्र का एक माला मंत्र जप किया जाए, तो आश्चर्यजनक प्रभाव देखने को मिलता है।
मंत्र जप के पश्चात् साधक लक्ष्मी आरती सम्पन्न कर, अपनी मनोकामना प्रकट करें।
   वस्तुतः आर्थिक उन्नति तथा भौतिक सुख-सम्पदा के लिए तो श्रीयंत्र से बढ़ कर कोई यंत्र संसार में है ही नहीं। वास्तव में वह घर दुर्भाग्यशाली है, जिस घर में श्रीयंत्र स्थापित नहीं है।इसमें कोई दो राय नहीं, कि श्री यंत्र में स्वतः ही कई सिद्धियों का वास है। श्रीयंत्र जिस घर में स्थापित कर इसकी पूजा की जाती है, तो उस घर में भौतिक दृष्टि से किसी प्रकार का कोई अभाव नहीं रहता। आर्थिक उन्नति तथा व्यापारिक सफलता के लिए तो यह यंत्र बेजोड़ है।
इसके अतिरिक्त ॠण मुक्ति, रोग निवृत्ति, स्वास्थ्य लाभ, पारिवारिक प्रसन्नता और आर्थिक सफलता प्राप्ति के लिए यह यंत्र सर्वश्रेष्ठ माना गया है। मंत्र सिद्ध प्राण प्रतिष्ठायुक्त प्रामाणिक श्रीयंत्र को घर में स्थापित कर देना ही पर्याप्त है, क्योंकि मात्र स्थापित करने से ही यह असीम सफलता देने में सहायक बन जाता है।
वस्तुतः श्री यंत्र पर जितना भी लिखा जाए, कम है। भौतिक और आर्थिक उन्नति के लिए इससे बढ़ कर कोई अन्य यंत्र या साधन नहीं है।
श्रीयंत्रों में विशेष – पारद श्रीयंत्र
पारद श्रीयंत्र तो अपने आप में ही भव्य और अद्वितीय माना जाता है, इसलिए कि इसका प्रभाव तुरंत और अचूक होता है, इसलिए कि जिस घर में भी पारद श्रीयंत्र होता है, उस घर में गरीबी रह ही नहीं सकती, जिस घर में पारद श्रीयंत्र स्थापित होता है, उसके घर में ॠण की समस्या संभव ही नहीं है, जिस घर में अपनी भव्यता के साथ पारद श्रीयंत्र स्थापित है, उसके घर में आठों लक्ष्मियां अपने सम्पूर्ण वेग के साथ आबद्ध रहती ही हैं।
    पारद भगवान शिव का विग्रह कहलाता है, समस्त देवताओं का पुंजीभूत स्वरूप पारे को माना गया है, और लक्ष्मी ने स्वयं स्वीकार किया है, कि ‘‘पारद ही मैं हूं और मेरा ही दूसरा स्वरूप पारद है। ’’ जब पारद श्रीयंत्र को स्थापित करते हैं, तो यह अपने आप में ही एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बन सकती है, यदि हम विधि-विधान के साथ पारद श्रीयंत्र को धन त्रयोदशी के दिन अपने घर में, दुकान में, कार्यालय में या व्यापारिक प्रतिष्ठान में स्थापित करते हैं, तो यह अपने आप में श्रेष्ठता, भव्यता और पूर्णता की ही उपलब्धि है।
     लक्ष्मी सूक्त के अनुसार इस पारद श्रीयंत्र को अपने घर में स्थापित कर इसके दर्शन करें, और श्रद्धा के साथ इसको अपने घर में स्थापित करें, तो निश्चय ही यह आपके लिए इस वर्ष की महत्वपूर्ण घटना मानी जाएगी। श्रीयंत्र, विशेषकर पारद श्रीयंत्र के माध्यम से तो आठों प्रकार की लक्ष्मियां पूर्ण रूप से आबद्ध होकर, उसे स्थापित करने वाले व्यक्ति के घर अपना प्रभाव देती ही हैं, संतान लक्ष्मी, व्यापार लक्ष्मी, धन लक्ष्मी, स्वास्थ्य लक्ष्मी, राज्य लक्ष्मी, वाहन लक्ष्मी, कीर्ति लक्ष्मी और आयु लक्ष्मी के साथ-साथ जीवन के अभाव, जीवन की दरिद्रता और जीवन के कष्ट दूर करने में इस प्रकार का श्रीयंत्र अपने आप में ही अनुकूलता और भव्यता प्रदान करता है।
‘ श्रीसूक्त ’ के अनुसार जिसके भी घर में पारद श्रीयंत्र स्थापित होता है, स्वतः ही वहां पर लक्ष्मी का स्थायी वास होता है, जिसके भी घर में पारद श्रीयंत्र होता है, अपने आप में वह व्यक्ति रोग-रहित एवं ॠण-मुक्त होकर जीवन में आनन्द एवं पूर्णता प्राप्त करने में सक्षम हो पाता है।
श्रीयंत्र कई प्रकारों में मिलता है, चन्दन पर अंकित श्रीयंत्र सफेद आक पर अंकित श्रीयंत्र, ताम्र पत्र पर अंकित श्रीयंत्र, पारद निर्मित श्रीयंत्र और यदि गणना की जाए तो लगभग 108 तरीकों से श्रीयंत्र अंकित किए जाते हैं, सबका अलग-अलग महत्व है, अलग-अलग विधान है।
सामान्य तय यंत्रों को यद्यपि मंत्रों से अलग माना जाता है लेकिन वास्तविकता यह है कि यंत्र यदि शिवरूप हैं तो मंत्र उनकी अंतर्निहित शक्ति है जो डन्हें संचालित करती है और जीवन के सभी साध्यों की प्राप्ति का साधन बनती है। इस लेख में यंत्र में अंकित विभिन्न रूपाकारों की दार्शनिकता एवं रहस्यों के वैज्ञानिक आधार का निरूपण और रहस्योद्घाटन किया गया है।
     यंत्र एक प्रकार से सुरक्षा कवच है और यह सही नक्षत्र और तिथि में कागज पर, भोजपत्र पर या तांबे पर बनाया जाता है जो ग्रह मारक या बाधक हो उस ग्रह की पूजा यंत्र द्वारा करें। युद्ध दशा-अंतर्दशा प्रत्यंतर्दशा में यंत्र लाभदायक होते हैं। यंत्र को मंत्र का रूप माना जाता है। यंत्र-रचना मात्र रेखांकन नहीं है बल्कि उसमें वैज्ञानिक तथ्य भी है। कुछ यंत्र रेखा प्रधान होते हैं, कुछ आकृति प्रधान और कुछ संख्या प्रधान होते है। कुछ यंत्रों में बीजाक्षरों का प्रयोग होता है। बीजाक्षर एक संपूर्ण यंत्र होता है। हर ग्रह का यंत्र अलग होता है। यह यंत्र केवल दीपावली, होली या ग्रहणकाल में ही बनाकर सिद्ध किया जा सकता है यदि स्वयं निर्माण कर सकते हैं तो ठीक, नहीं तो किसी विद्वान से इन्हें बनवा सकते हैं।
जानिए की यंत्र किस सिद्धांत पर कार्य करते हैं?
तंत्र के अनुसार यंत्र मे चमत्कारिक दिव्य शक्तियों का निवास होता है लेकिन श्री यंत्र बिना सिद्ध किए नहीं रखना चाहिए। यंत्र सामान्यतः ताम्रपत्र पर बनाए जाते हैं। इसके अलावा यंत्रों को तांबे, चांदी, सोने और स्फटिक में भी बनाया जाता है। ये चारों ही पदार्थ कास्मिक तरंगे उत्पन्न करने और ग्रहण करने की सर्वाधिक क्षमता रखते हैं। कुछ यंत्र भोज-पत्र पर भी बनाए जाते हैं। 
      यंत्र देवी-देवताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। किसी लक्ष्य को शीघ्र प्राप्त करने के लिए यंत्र-साधना को सबसे सरल विधि माना जाता है। तंत्र के अनुसार यंत्र मंे चमत्कारिक दिव्य शक्तियों का निवास होता है। यंत्र सामान्यतः ताम्रपत्र पर बनाए जाते हैं। इसके अलावा यंत्रों को तांबे, चांदी, सोने और स्फटिक में भी बनाया जाता है। ये चारों ही पदार्थ कास्मिक तरंगे उत्पन्न करने और ग्रहण करने की सर्वाधिक क्षमता रखते हैं। कुछ यंत्र भोज-पत्र पर भी बनाए जाते हैं। यंत्र मुख्यतः तीन सिद्धांतों का संयुक्त रूप हैं- आकृति रूप, क्रिया रूप, शक्ति रूप ऐसी मान्यता है कि वे ब्रह्मांड के आंतरिक धरातल पर उपस्थित आकार व आकृति का प्रतिरूप हैं। जैसा कि सभी पदार्थों का बाहरी स्वरूप कैसा भी हो, उसका मूल अणुओं का परस्पर संयुक्त रूप ही हैं। इस प्रकार यंत्र में, विश्व की समस्त रचनाएं समाहित हैं। यंत्र को विश्व-विशेष को दर्शाने वाली आकृति कहा जा सता हैं। ये सामान्य आकृतियां ब्रह्ममांड से नक्षत्र का अपनी एक विशेष आकृति रूप-यंत्र होता हैं। यंत्रों की प्रारंभिक आकृतियां मनोवैज्ञानिक चिन्ह हैं जो मानव की आंतरिक स्थिति के अनुरूप उसे अच्छे बुरे का ज्ञान, उसमें वृद्धि या नियंत्रण को संभव बनाती हैं। इसी कारण यंत्र क्रिया रूप हैं। ‘‘यंत्र’’ की निरंतर निष्ठापूर्वक पूजा करने से ‘आंतरिक सुषुप्तावस्था समाप्त होकर आत्मशक्ति जाग्रत होती हैं और आकृति और क्रिया से आगे जाकर ‘‘शक्ति रूप उत्पन्न होता हैं। जिससे स्वतः उत्पन्न आंतरिक परिवर्तन का मानसिक अनुभव होने लगता हैं। इस स्थिति पर आकर सभी रहस्य खुल जाते हैं।
    यंत्र विविध प्रकार में उपलब्ध होते हैं कूर्मपृष्ठीय यंत्र, धरापृष्ठीय यंत्र, मेरुपृष्ठीय यंत्र, मत्स्ययंत्र, मातंगी यंत्र, नवनिधि यंत्र, वाराह यंत्र इत्यादि यह यंत्र स्वर्ण, चांदी तथा तांबे के अतिरिक्त स्फटिक एवं पारे के भी होते हैं. सबसे अच्छा यंत्र स्फटिक का कहा जाता है यह मणि के समान होता है. भक्त, संत, तांत्रिक संन्यासी सभी इस यंत्र की प्रमुखता को दर्शाते हें तथा इन्हें पूजनीय मानते हैं.
    यंत्रों में मंत्रों के साथ दिव्य अलौकिक शक्तियां समाहित होती हैं. इन यंत्रों को उनके स्थान अनुरूप पूजा स्थान, कार्यालय, दुकान, शिक्षास्थल इत्यादि में रखा जा सकता है. यंत्र को रखने एवं उसकी पूजा करने से धन-धान्य में वृद्धि होती है और सफलता प्राप्त होती है. श्रीयंत्र विभिन्न आकार के बनाए जाते हैं जैसे अंगूठी, सिक्के, लॉकेट या ताबीज रुप इत्यादि में देखे जा सकते हैं.
    यंत्र शास्त्र के अतंर्गत कई ऐसे दुर्लभ यंत्रों का वर्णन है जिनका विधि-विधान से पूजन करने से अभिष्ट फल की सिद्धि होती है, यंत्र की चल या अचल दोनों तरह से प्रतिष्ठा की जा सकती है यह यंत्र धन प्राप्ति, शत्रु बाधा निवारण, मृत्यंजय जैसे कार्यों लिए रामबाण प्रयोग होते हैं. अपने आप में अचूक, स्वयं सिद्ध, ऐश्वर्य प्रदान करने में सर्वथा समर्थ यह यंत्र जीवन को सुख व सौम्यता से भर देता है.
  यद्यपि यंत्र का स्थूल अर्थ समझना सरल हैं। परंतु इसका आंतरिक अर्थ समझना सरल नहीं, क्योंकि मूलतः श्रद्धापूर्वक किये गए प्रयासों के आत्मिक अनुभव से ही इसे जाना जा सकता हैं। यंत्र की प्राण-प्रतिष्ठा पंचगव्य, पंचामृत एवं गंगाजल से पवित्र करके संबंधित मंत्र से की जाती हैं। बिना प्राण-प्रतिष्ठा के यंत्र को पूजा स्थल पर नहीं रखा जाता। ऐसा करने से नकारात्मक किरणों के प्रभाव से हानि होने की संभावना रहती हैं। पूजा हेतु मार्गदर्शन, अनेक प्रकार के यंत्रों को एक बार प्राण-प्रतिष्ठा के पश्चात् नियमित पूजा की आवश्यकता नहीं होती और वे जीवन पर्यंत रखे जा सकते हैं। यंत्रों पर आधारित कुछ विशेष मंदिर यंत्रों की अदभुत महिमा को देखते हुए, यहां प्राचीन काल से ही यंत्रों पर आधारित मंदिरों का निर्माण किया जाता रहा हैं।  यह भी मान्यता रही है कि जो मंदिर यंत्र आधारित होते हैं, वे अपना विशेष धार्मिक महत्व रखते हैं। 
ऐसे ही कुछ मंदिरों की संक्षिप्त जानकारी देने का प्रयास--
  1. श्री यंत्र मंदिर:—- यह श्री यंत्र मंदिर हरिद्वार के कनखल नामक स्थान का विशेष मंदिर हैं। यह मंदिर अपने आप में अदभुत कला का आदर्श नमूना हैं। इस मंदिर में विशेष रूप से त्रिपुर सुंदरी की पूजा की जाती हैं। इसकी इस्थापना मेरे दीक्षा गुरु परम पूजनीय ब्रह्मलीन स्वामी विशदेवनंद जी द्वारा कुम्भ 2010  में संपन्न हुयी थी | इस मंदिर में माँ त्रिपुरा सुंदरी की बहुत दिव्य प्रतिमा विराजित हैं |
  2. आयल का मेंढक मंदिर भारत का एकमात्र मेंढक मंदिर हैं। यह मंदिर उत्तरप्रदेश में लखनऊ के आॅयल कस्बे में हैं। मेंढक मंदिर देश में अपने ढंग का अकेला और अनोखा मंदिर हैं। इसका निर्माण राज्य को सूखे व बाढ़ जैसी आपदाओं से बचाने के उद्देश्य से किया गया था। मंडूक यंत्र पर आधारित यह मंदिर ग्यारहवीं शती के शासकों के द्वारा किया गया था। इसकी रचना तंत्रवाद पर आधारित हैं। इसकी परिकल्पना एक प्रसिद्ध तांत्रिक ने की थी।

यंत्रों की उपयोगिता यंत्र देवशक्तियों के प्रतिक हैं। जो व्यक्ति मंत्रों का उच्चारण नहीं कर सकते, उनके लिए पूजा में यंत्र रखने से ही मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं। प्रत्येक यंत्र का अपना अलग महत्व है। कई यंत्र हमें सुख-समृद्धि प्रदान करते हैं। प्राचीन काल से ही, भारतीय संस्कृति में सुख-समृद्धि, दीर्घजीवन, एवं अच्छे स्वास्थ्य के लिए, यंत्र, तंत्र-मंत्र का महत्वपूर्ण स्थान रहा हैं। विभिन्न प्रकार की आध्यात्मिक महत्व की आकृतियों यंत्र के रूप में, सोने, चांदी, तांबा, अष्टधातु अथवा भोज पत्र पर विभिन्न शक्तियों को जाग्रत करने के लिए बनाई जाती हैं।
     मनुष्य अपनी जिज्ञासु प्रवृति के कारण प्रकृति एवं ब्रह्मांड के रहस्यों के बारे में जानने के लिए सदैव प्रयत्नशील रहा है। यह भी सर्वमान्य एवं सर्वविदित है कि ब्रह्मांड में स्थित समस्त चर अचर जगत में आपसी संबंध है तथा समस्त ब्रह्मांड एक लयबद्ध तरीके से निश्चित नियमों के आधार पर कार्य करता है। भारतीय वैदिक शास्त्रों के अनुसार ब्रह्मांड की समस्त क्रियायें ब्रह्ममांड में स्थित विभिन्न शक्तियों द्वारा संचालित की जाती है। चूंकि मनुष्य भी इसी ब्रह्मांड का एक प्रमुख भाग है अतः मानव जीवन भी बहुत हद तक इन्ही शक्तियों द्वारा नियंत्रित एवं संचालित किया जाता है। ये शक्तियां मनुष्यों के जीवन को उनके कर्मों के अनुसार नियंत्रित एवं निर्देशित करती है। अतः मानव जीवन के संचालन में इन शक्तियों की अहम भूमिका होती है। भारतीय वैदिक साहित्य में ऐसी अनेक विधियों का वर्णन मिलता है जिसके माध्यम से इन शक्तियों का आवाहन किया जा सकता है तथा इनकी कृपा एवं आशिर्वाद प्राप्त किया जा सकता है।
यह हैं यंत्रों के संक्षिप्त शब्द व अंक—-
यंत्रों के संक्षिप्त शब्द एवं अंक वास्तव में देवी और देवता होते हैं जैसे कि विज्ञान का विद्यार्थी जानता है कि भ्2व् का अर्थ है अर्थात पानी जबकि सामान्यजन नहीं जान पाते हैं इसी प्रकार यंत्रों में उल्लिखित शब्द ह्रीं, क्रीं, श्रीं और क्लीं का क्या अर्थ है एक ज्योतिषी या तांत्रिक ही जान सकता है यह सब देवी के संक्षिप्त नाम हैं जैसे ह्रीं का अर्थ बगलामुखी देवी, क्रीं का अर्थ महाकाली से, श्रीं का अर्थ महालक्ष्मी से, क्लीं का अर्थ भगवती दुर्गा से है।
इसी प्रकार से यंत्रों के निर्माण में प्रयुक्त होने वाले चिह्न बिंदु का अर्थ ब्रह्म से, त्रिकोण का अर्थ है शिव एवं भूपूर का अर्थ भगवती से होता है।
यंत्रों में श्रद्धा एवं विश्वास का प्रभाव :—-
यंत्र तभी अपना कार्य करते हैं जब इनको निर्माण करने वाला साधक श्रद्धा एवं विश्वास के साथ पूर्ण मनोयोग एवं पवित्रता के साथ तथा नियमों की जानकारी प्राप्त करके करता है। यदि यंत्र के निर्माण में संदेह होगा तो यंत्र मृत हो जायेगा। इसी के साथ यंत्रों के निर्माण में उपरोक्त बातों एवं अन्य नियमों का ध्यान रखना चाहिए अन्यथा यंत्र निर्माण करने वाले को हानि भी पहुंचा देते हैं। यंत्र ऊर्जा विज्ञान का एक शक्तिशाली माध्यम है। यंत्र विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए निर्मित किये जाते हैं।
    इनका वर्गीकरण होता है परंतु उनका शास्त्रानुसार प्रयोग, कोई विषम स्थिति न हो तो, अच्छे कार्यों में ही करना चाहिए जिनका विवरण निम्न प्रकार है- शांतिकर्म यंत्र: यह वह यंत्र होते हैं जिनका उद्देश्य कल्याणकारी और शक्तिप्रद कार्यों के लिए किया जाता है। इससे किसी का अहित नहीं किया जा सकता है। इनका मूल प्रयोग रोग निवारण, ग्रह-पीड़ा से मुक्ति, दुःख, गरीबी के नाश हेतु, रोजगार आदि प्राप्त करने में किया जाता है जैसे श्रीयंत्र।

  • स्तंभन यंत्र:—– आग, हवा, पानी, वाहन, व्यक्ति, पशुओं आदि से होने वाली हानि को रोकने के लिए इस प्रकार के यंत्रों का प्रयोग किया जाता है। इसका प्रयोग करने से उपरोक्त कारणों से आई हुई विपदाओं का स्तंभन किया जाता है अर्थात उन पर रोक लगाई जाती है।
  • सम्मोहन यंत्र:—ये यंत्र वह होते हैं जिनसे किसी वस्तु या मनुष्य को सम्मोहित किया जाता है। उच्चाटन यंत्र: ये यंत्र वह होते हैं जिनसे प्राणी में मानसिक अस्थिरता, भय, भ्रम, शंका और कार्य से विरत रहने का कार्य लिया जाता है। इन यंत्रों का प्रयोग वर्जित माना जाता है।
  • वशीकरण हेतु यंत्र:—-इन यंत्रों के द्वारा प्राणियों, प्रकृति में उपस्थित तत्वों का वशीकरण किया जाता है। इनके प्रयोग से संबंधित व्यक्ति धारण करने वाले के निर्देशों, आदेशों का पालन करते हुए उसके अनुसार आचरण करने लगता है।
  • आकर्षण हेतु यंत्र:—–सम्मोहन, वशीकरण, इस यंत्र में बहुत मामूली-सा अंतर है। सामान्यतः ये तीनों एक ही यंत्र हैं पर आकर्षण यंत्र के प्रयोग से दूरस्थ प्राणी को आकर्षित कर अपने पास बुलाया जाता है।
  • जुम्मन हेतु यंत्र:—-इस यंत्र के प्रयोग से इच्छित कार्य हेतु संबंधित व्यक्ति को आज्ञानुसार कार्य करने के लिए विवश किया जाता है। इसके प्रभाव में आने से व्यक्ति अपना अस्तित्व भूलकर साधक की आज्ञानुसार कार्य करने लगता है। वास्तव में इसके द्वारा प्राणी में दासत्व की भावना पैदा करके उससे कार्य लिया जाता है।
  • विद्वेषण यंत्र:—-इन यंत्रों के माध्यम से प्राणियों में फूट पैदा करना, अलगाव कराना, शत्रुता आदि कराना होता है। इससे प्राणी की एकता, सुख, शक्ति, भक्ति को नष्ट करना होता है।
  • मारणकर्म हेतु यंत्र:—–इन यंत्रों के द्वारा अभीष्ट प्राणी, पशु-पक्षी आदि की मृत्यु का कार्य लिया जाता है। इसके प्रयोग से संबंधित मृत्यु को प्राप्त हो जाता है। वास्तव में यह हत्याकर्म है। इन यंत्रों का प्रयोग सपने में भी नहीं करना चाहिए। यह सबसे घृणित यंत्र है।
  • पौष्टिक कर्म हेतु यंत्र:—-किसी का भी अहित किये बिना साधक अपने सिद्ध यंत्रों से अन्य व्यक्तियों के लिए धन-धान्य, सुख सौभाग्य, यश, कीर्ति और मान-सम्मान की वृद्धि हेतु प्रयोग करता है, उन्हें पौष्टिक कर्म यंत्र कहते हैं।

प्रत्येक यंत्र हर समस्या का समाधान नहीं हो सकता। उसका पूर्ण लाभ प्राप्त करने के लिए जातक की जन्मकुंडली में निर्बल योग कारक ग्रह की खोज करके यदि संबंधित यंत्र का प्रयोग करें तो अवश्य ही यथेष्ट लाभ प्राप्त कर सकते हैं। इस लेख में सभी ग्रहों से संबंधित पृथक-पृथक यंत्र और रोग निवारक तेल बनाने की विधि के बारे में बताया गया है। कुंडली में लग्न और चंद्रमा की स्थिति से उपायों की जानकारी मिलती है। ग्रह यदि अग्नि तत्व राशि में है तो यज्ञ, व्रत आदि से लाभ मिलता है।
      हिंदु संस्कृति में मंदिर जो कि देवी-देवताओं के पूजा स्थल होते हैं, इनका निर्माण वास्तु शास्त्र के सिद्धांतों के अनुसार किया जाता है। मंदिरों के स्थान का चयन, मूर्ति स्थापना मंदिरों के उपर स्थित गुंबद एवं ध्वजा आदि सभी का निर्माण वास्तु शास्त्र के नियमों के अनुसार किया जाता है जिससे वहां पर अधिक से अधिक आध्यात्मिक एवं दैवीय कृपा आ सके। हिंदु संस्कृति में देवी देवताओं को आवाहन करने के अनेक तरीके बताए गये हैं। पूजा करते समय बैठने का ढंग ईश्वर के सामने दंडवत, नतमस्तक होना एक स्थान पर ध्यान केंद्रित करना श्वास प्रक्रिया आत्म नियंत्रण आदि ईश्वर की आराधना के मूलभूत तरीके हैं। इनके माध्यम से मनुष्य ईश्वर के समक्ष स्वयं के शरीर एवं मन को पूर्ण रूप से समर्पित करता है। यह कहना अत्यंत सरल है। परंतु इसका पालन करना कठिन होता है। सही अर्थो में देखा जाए तो शरीर एवं मन का ईश्वर को पूर्णतः समर्पण सबसे बड़ा साधन कहा जा सकता है। यदि हम इसमें सफल हो जाते हैं तो दैवीय शक्तियों की कृपा पात्र अवश्य बनते हैं इसमें कोई संशय नहीं है। इस प्रकार कोई भी पूजा एवं अर्चना तब तक पूरा फल नहीं देती है जब तक कि आराधक या याचक इसे पूर्ण शुद्धि एवं गहनता से नही करे तथा अपने आप को ईश्वर के चरणों में पूर्णतः समर्पित न करे। क्योंकि जरा भी अहंकार साधक की संपूर्ण शक्ति का क्षय कर देता है। यह समस्त ब्रह्मांड शिव एवं शक्ति के सहयोग से संचालित होता है।
      शिव का अर्थ संक्षेप में ब्रह्मांड में स्थित ऊर्जा से है जिसका कोई स्वरूप नही है। जबकि प्रकृति साक्षात शक्ति है तथा ब्रह्मांड में स्थित ऊर्जा को स्वरूप प्रकृति में स्थित पांच तत्वों के सहयोग से ही मिल पाता है। इन दोनों में से एक भी अभाव में साकार संसार की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। शिव के बिना शक्ति बलहीन है तथा शक्ति के बिना निर्गुण, निराकार शिव स्वरूप हीन व आकार हीन है। अतः यह संसार शिव एवं शक्ति दोनों के सहयोग से ही संचालित होता है। मानव शरीर इसी ब्रह्मांड का सूक्ष्म रूप कहा जा सकता है तथा यह भी शिव (आत्मा) एवं शक्ति के संयोग से ही संचालित होता है। इस प्रकार मानव शरीर में स्थित आत्मा शिव द्वारा नियंत्रित होती है जबकि मानव शरीर एवं मष्तिष्क प्रकृति जिसको कि महामाया भी कहा जाता है द्वारा संचालित होते है। इस प्रक्रिया में शिव रूप अनेक बार गौण हो जाता है तथा मस्तिष्क एवं शरीर का वर्चस्व हो जाता है जिससे आत्मा को कर्म बंधन में बंधकर जन्म-मरण की प्रक्रिया से बार-बार गुजरना पड़ता है तथा अनेक कष्ट सहने पड़ते हैं। अतः मानव जीवन के संतुलित रूप से संचालन हेतु शिव एवं शक्ति में संतुलन होना आवश्यक होता है। 
        मानव जीवन में स्थित इस असंतुलन को दूर करने के लिये तथा इनमें आपसी सामंजस्य स्थापित करने के लिये भारतीय वेदों एवं पुराणों में अनेक विधियों का उल्लेख किया है। यंत्र, मंत्र एवं तंत्र उनमें से प्रमुख है। मंत्र: भारतीय वैदिक साहित्य में हिंदी वर्णमाला के प्रत्येक अक्षर को एक मंत्र की संज्ञा दी गई है। वही नाद ब्रह्म है। प्रत्येक मंत्र में कितने अक्षर होंगे। इसका चयन मंत्र के फल के अनुसार किया गया है। मंत्र में स्थित अक्षरों की संख्या क े अनसु ार मत्रं क े फल म ंे परिवतर्न हाते ा है। उदाहरणार्थ ऊँ नमः शिवाय में 6 अक्षर ह ंै इसलिय े इस े षडाक्षरी मत्रं कहते हैं। इसमें यदि ऊँ न प्रयुक्त किया जाये एवं केवल नमः शिवाय उच्चारित किया जाये तो यह पंचाक्षरी मंत्र बन जाता है। इसी प्रकार ऊँ नमो नारायणाय अष्टाक्षरी मंत्र कहलाता है तथा ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय द्वादशाक्षरी मंत्र कहलाता है। इस प्रकार मंत्रों का उचित चयन करके विभिन्न दैविय शक्तितयों का आवाहन किया जाता है तथा विभिनन उद्देश्यों की पूर्ति की जाती है। यंत्र, मंत्र एवं तंत्र इन माध्यमों को अपनाकर दैवीय शक्तियों का आवाहन किया जाता है एवं उनसे प्रार्थना, याचना की जाती है जिससे कि वे मनुष्य के भौतिक, आध्यात्मिक विकास में संतुलन स्थापित कर सकें तथा मानव जीवन को सुखी बना सकें।
         यंत्र, मंत्र एवं तंत्र शास्त्र को एक पूर्ण विकसित आध्यात्मिक विज्ञान की संज्ञा दी जा सकती है। जिसका उद्ेश्य शरीर, मन एवं आत्मा के विकास में एक संतुलन स्थापित करना तथा मनुष्य का भौतिक एवं आध्यात्मिक विकास करना है। यदि मंत्रों को वैदिक रीति से पूर्ण शुद्धता एवं श्रद्धा के साथ उच्चारित किया जाता है तो इनके उच्चारण से निकलने वाली तरंगे उस दैवीय शक्ति के तरंगों से संपर्क स्थापित कर सकती है जिसको प्रसन्न करने के लिये ये मंत्र उच्चारित किये जाते हैं। हमारे ऋषियों को इन तरंगों की जानकारी थी तथा उन्होंने मंत्रों के माध्यम से इन तरंगों का उपयोग मनुष्य की आध्यात्मिक विकास एवं मानसिक शान्ति के लिये किया। मंत्रों का यदि विधिवत रूप से उच्चारण किया जाए तो इनसे निकलने वाली तरंगे शरीर में सकारात्मक ऊर्जा के प्रवाह को बढ़ाती है और मानव शरीर से निकलने वाली तरंगे संबंधित दैवीय तरंगों के संपर्क में आकर मानव मस्तिष्क एवं शरीर पर सकारात्मक प्रभाव डालती है। तथा शब्दों के क्रम का विपर्याय होने पर नकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह होने लगता है। यंत्रों को सक्रिय एव शक्तिपूर्ण बनाने की क्षमता भी मंत्रों में ही हैं। उसके बिना यंत्र आकार मात्र रह जाऐंगे।
 यंत्र: -- 
मंत्रों की एक रेखाचित्र के माध्यम से अभिव्यक्ति को यंत्र कहते हैं। जिस प्रकार मानव शरीर विशालकाय ब्रह्मांड का सूक्ष्म रूप है। उसी प्रकार विशालकाय ब्रह्मांड को सूक्ष्म रूप में अभिव्यक्त करने के लिये ये यंत्र बनाये जाते हैं। यहां यह उल्लेखनीय है कि मंत्रों एवं यंत्रों का आविष्कार किसने किया है यह कहना बहुत कठिन है क्योंकि इसका कहीं पर भी उल्लेख नहीं मिलता है। चूंकि इन यंत्रो का उल्लेख वेदों एवं पुराणों में मिलता है और वेदों के बारे में कहा जाता हैं कि वे अपौरूपेय है इसलिए उनमें मंत्रों के रचयिताओं का इतिहास और जीवनवृत न होकर जीवन दर्शन और रहस्य सूत्र रूप में ही निरूपित हुआ है। जो कि भाषा और शब्दों की श्लेष शक्ति का पूर्ण समावेश है। अतः यंत्र एवं मंत्रों का रचना भी दैविय शक्तियों द्वारा ही की गई है। इन मंत्रों का रहस्योदघाटन हमारे ऋषि एवं मुनियों ने किया है। जिससे आम आदमी इनका लाभ उठा सके।
     यंत्र विशिष्ट देवी-देवताओं का प्रतिनिधित्व करने वाली ऐसी आकृतियां होती हैं जो आकृति, क्रिया तथा शक्ति नामक तीन सिद्धांतों के आधार पर संयुक्त रूप से कार्य करती है। परंतु इन यंत्रों की आकृति निष्ठापूर्वक और विधि-विधान से की गई पूजा एवं प्राण प्रतिष्ठा से ही जागृत होती है। बिना प्राण-प्रतिष्ठा के यंत्र को पूजा स्थल पर भी नहीं रखा जाता है क्योंकि ऐसा करने से सकारात्मक प्रभाव के स्थान पर नकारात्मक प्रभाव होने लगते हैं। शास्त्रों में यंत्रों को देवी-देवताओं का निवास स्थान माना गया है।
     जब यंत्रों का निर्माण और प्राण-प्रतिष्ठा शास्त्रोक्त विधि द्वारा की गई हो और साधक पूर्ण विश्वास तथा श्रद्धा के साथ उनकी आराधना करता हो तो यंत्र-साधना करने वालों को सुख-ऐश्वर्य और समृद्धि की प्राप्ति होती है। यंत्र क्या है? इसमें कितनी दिव्य शक्ति विद्यमान है? भिन्न प्रकार के यंत्रों की रेखाएं, बीजाक्षर और बीजांक दिव्य शक्तियों से प्रभावित होते हैं। रेखाओं की आकृति, क्रम व अंकों और अक्षरों के आधार पर ही यंत्र को कोई विशिष्ट नाम दिया जाता है। इसमें अंकित अंक और अक्षर देवता से संबंधित बीजांक शक्ति का प्रतीक होते हैं। यंत्र व मंत्र एक दूसरे के पूरक है
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